यहा पाती से तय होती है शादी की तारीख, मन्नत पूरी होने पर सीधा स्वस्तिक बनाते हैं भक्त
राजगढ़ l जिले के प्रसिद्ध जालपा माता मंदिर में नवरात्रि के पहले दिन रविवार को सुबह से ही श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी। भक्तों ने माता के दर्शन कर सुख-समृद्धि की कामना की। कई लोग परिवार के साथ पहुंचे, कुछ पैदल एक किलोमीटर पहाड़ी चढ़कर आए। घने जंगल में ऊंची पहाड़ी पर स्थित यह मंदिर 1100 साल से ज्यादा पुराना बताया जाता है। यह मंदिर विवाह की तारीख तय करने की अनोखी परंपरा पाती के लिए भी जाना जाता है। पंचांग में मुहूर्त न मिलने पर पुजारी दानों की गणना कर विवाह की तारीख भी यहा बताते हैं। उज्जैन के महाकाल मंदिर की तर्ज पर यहां लड्डू प्रसाद के पैकेट बेचने के लिए काउंटर भी लगेगा। नवरात्रि के दौरान भक्तों की बढ़ती संख्या को देखते हुए प्रसाद वितरण और दर्शन व्यवस्था महत्वपूर्ण रहेगी। स्थानीय लोगों के अनुसार, शादी होने के बाद कई परिवार नवविवाहित जोड़े के साथ दोबारा माता के दर्शन करने पहुंचते हैं और पूजा-अर्चना करते हैं। इस तरह मंदिर में दर्शन के साथ विवाह की तारीख तय करने की परंपरा भी पीढ़ियों से चली आ रही आस्था का हिस्सा बनी हुई है।
- मन्नत पूरी होने पर सीधा स्वस्तिक बनाते हैं भक्त
मंदिर में मनोकामना और मन्नत पूरी होने से जुड़ी एक और परंपरा प्रचलित है। मान्यता के अनुसार, श्रद्धालु अपनी मनोकामना लेकर आते हैं तो मंदिर में उल्टा स्वस्तिक बनाते हैं। मनोकामना पूरी होने पर वे दोबारा माता के दरबार पहुंचकर सीधा स्वस्तिक बनाते हैं। श्रद्धालु इसे अपनी मन्नत पूरी होने के प्रतीक के रूप में देखते हैं। नवरात्रि में भी कई भक्त माता के दर्शन के साथ अपनी मनोकामनाएं लेकर पहुंचते हैं। जालपा माता मंदिर घने जंगल के बीच ऊंची टेकरी पर स्थित है। यहां पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को करीब एक किलोमीटर की चढ़ाई चढ़नी पड़ती है। पहाड़ी रास्ते से होकर मंदिर तक पहुंचने वाले भक्तों के लिए दर्शन की यात्रा भी आस्था का हिस्सा है। नवरात्रि के दौरान राजगढ़ के अलावा राजस्थान और दूसरे क्षेत्रों से भी श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं।
स्थानीय मान्यता के अनुसार, ज्वालानाथ नाम के एक भक्त ने यहां तपस्या की थी। इसी दौरान पीपल के पेड़ के नीचे माता की प्रतिमा मिलने की कथा प्रचलित है। प्रतिमा में माता को सिंह पर सवार बताया जाता है। मंदिर के निर्माण को लेकर भी स्थानीय लोगों के बीच पुरानी कथाएं प्रचलित हैं। कहा जाता है कि पुराने समय में राजाओं ने यहां मंदिर बनवाने का प्रयास किया था। मंदिर की सेवा से स्थानीय भील परिवारों की परंपरा जुड़े होने की बात भी कही जाती है।

