“बेड़ियाँ तोड़ने की सज़ा” : बराबरी के संघर्ष और सत्ता का सच
कुछ किताबें अपने समय की बेचैनी को शब्द देती हैं। संतोष पटेल का कविता-संग्रह ‘बेड़ियों को तोड़ने की सज़ा’ ऐसी ही बेचैनी से उपजा है। इनकी कविताओं के केंद्र में जाति, श्रम, आर्थिक विषमता, राजनीतिक सत्ता, सांस्कृतिक वर्चस्व और साहित्यिक प्रतिष्ठा के वे समीकरण हैं, जो समाज में मनुष्यों की हैसियत तय करते हैं। संग्रह का शीर्षक उस बुनियादी विडंबना को उजागर करता है कि जो व्यवस्था मनुष्य को बाँधती है, उसी व्यवस्था में बंधन तोड़ने की कोशिश अपराध बन जाती है। बराबरी की माँग करने वाले को प्रतिरोध का सामना क्यों करना पड़ता है? संतोष पटेल की कविताएँ इसी सवाल के अलग-अलग पहलुओं से जूझती हैं।
संग्रह की वैचारिक दिशा जातिगत वर्चस्व और सामाजिक असमानता की आलोचना से निर्धारित होती है। ‘फिर कैसा भेद?’, ‘जेल में जाति’, ‘संविधान’ और ‘वाल्मीकि बनाम तुलसी’ जैसी कविताएँ बताती हैं कि सामाजिक हैसियत का निर्धारण जन्म के आधार पर आधुनिक संस्थाओं में भी अपना प्रभाव बनाए रखता है। ‘जेल में जाति’ में कारावास के भीतर काम, आवास और सुविधाओं के जातिगत बँटवारे का सवाल उठता है। जेल, जहाँ कानून के सामने समानता का विचार लागू होना चाहिए, वहाँ भी पुरानी सामाजिक श्रेणियों की मौजूदगी व्यवस्था की गहरी जड़ों को उजागर करती है।
‘संविधान’ में बराबरी और प्रतिनिधित्व की आकांक्षा को ऐतिहासिक अर्थ मिलता है। संविधान उन लोगों के लिए सार्वजनिक जीवन के दरवाजे खोलता है, जिन्हें लंबे समय तक अधिकारों और अवसरों से दूर रखा गया। इस बदलाव से पुराने विशेषाधिकारों को चुनौती मिलती है। कवि का आग्रह है कि मनुष्य की गरिमा का आधार उसका जन्म या परंपरागत दर्जा नहीं, उसकी समान नागरिकता होनी चाहिए।
संग्रह का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष श्रम और सामाजिक प्रतिष्ठा के बीच असमान संबंधों की पड़ताल है। ‘योग्यता का कवच’ में कवि उन लोगों पर प्रहार करता है जो योग्यता का दावा करते हैं, लेकिन श्रम करने वालों के योगदान को उचित सम्मान देने से बचते हैं। यहाँ योग्यता का प्रश्न सामाजिक परिस्थितियों से जुड़ जाता है। किसे शिक्षा और संसाधन मिले, किसे अवसर प्राप्त हुए और किसके श्रम से संपन्नता पैदा हुई, इन सवालों के बिना योग्यता का मूल्यांकन अधूरा है। ‘मुद्रा खुद नहीं चलती’ इसी असमानता को धन की शक्ति के माध्यम से व्यक्त करती है। प्रतिष्ठा, प्रभाव और सार्वजनिक महत्त्व के बड़े-बड़े दावे अंततः आर्थिक शक्ति के सामने झुकते दिखाई देते हैं।
राजनीतिक सत्ता और सामाजिक न्याय का संघर्ष कविता में विशेष रूप से मुखर है। मंडल, छात्र आंदोलन और सामाजिक न्याय की राजनीति के संदर्भों के सहारे कवि सत्ता में हिस्सेदारी के प्रश्न को उठाता है। मिट्टी में दबे बीज का रूपक बताता है कि किसी विचार को दबाने की कोशिश उसे हमेशा समाप्त नहीं कर सकती। अनुकूल परिस्थितियाँ मिलने पर वह फिर उग सकता है। इतिहास यहाँ स्थिर घटनाओं का संग्रह नहीं, बदलते सामाजिक संबंधों और जारी संघर्षों की प्रक्रिया बनकर सामने आता है।
सत्ता की आलोचना साहित्यिक दुनिया तक भी पहुँचती है। ‘स्त्री स्वर और हाशिये का कवि’ में संपन्न घरों के लोग घरेलू कामगारों की पीड़ा सुनकर साहित्य रचते हैं और फिर वंचितों की आवाज़ के प्रतिनिधि बन जाते हैं। कविता इस विडंबना को उजागर करती है कि दूसरों के अनुभव से साहित्यिक प्रतिष्ठा अर्जित करना आसान है, जबकि अपने वास्तविक व्यवहार में समानता स्वीकार करना कठिन होता है। ‘बड़े कवि ज़रूरी कवि नहीं होते’ और ‘सदी के महान लोग’ पुरस्कारों, आलोचना, प्रकाशन और संस्थागत प्रतिष्ठा के तंत्र पर सवाल उठाती हैं। कवि के अनुसार साहित्यिक महानता का निर्णय भी सामाजिक संबंधों और प्रभावशाली समूहों से अछूता नहीं है।
भाषा और संस्कृति पर लिखी गई कविताएँ संग्रह का एक और महत्त्वपूर्ण पक्ष हैं। ‘पुरखों की देन’ लोकमसमुदायों के गीत, नृत्य और शिल्प को पहचान तथा श्रेय के सवाल से जोड़ती है। ‘नहीं चाहिए विश्वभाषा’ में एक भाषा के प्रभुत्व से दूसरी भाषाओं और उनमें संचित ज्ञान के मिटने की आशंका व्यक्त होती है। भाषा यहाँ संवाद का साधन भर नहीं, सामुदायिक स्मृति और ऐतिहासिक अनुभव की वाहक है। किसी भाषा को श्रेष्ठ और दूसरी को पिछड़ा मानने की प्रवृत्ति सांस्कृतिक असमानता को भी जन्म देती है।
संग्रह में संवेदना के कुछ सुंदर क्षण भी हैं। ‘जमीन की खुशबू’ महानगर की भागदौड़ के बीच गाँव, बचपन और छूटते संबंधों की स्मृति जगाती है। ‘विगन और प्रोटीन’ में संपन्न लोगों की खानपान संबंधी बहसों के समानांतर एक गरीब स्त्री मुर्गे की दुकान से फेंके जाने वाले पंखों के नीचे लगी त्वचा और चर्बी लेने पहुँचती है। यह दृश्य भोजन के प्रति दो वर्गों के अलग-अलग अनुभवों को सामने रखता है। किसी के लिए भोजन पसंद और नैतिकता का विषय है, किसी के लिए उपलब्ध संसाधनों से पेट भरने का संघर्ष।
शिल्प की दृष्टि से संतोष पटेल की भाषा सीधी, संवादधर्मी और व्यंग्यप्रधान है। वे कठिन सामाजिक प्रश्नों को परिचित बिंबों और रोजमर्रा के उदाहरणों के माध्यम से व्यक्त करते हैं। उनकी कविता का बल स्पष्ट वैचारिक हस्तक्षेप और अन्याय के प्रति मुखर प्रतिरोध में है। हालाँकि, कुछ रचनाओं में निष्कर्ष पहले ही घोषित हो जाता है और आरोपात्मक स्वर कविता की बहुअर्थी संभावनाओं को सीमित करता है। राजनीतिक पक्षधरता के साथ आत्मालोचना और विरोधी पक्ष के अंतर्विरोधों की अधिक गहरी पड़ताल होती, तो संग्रह की आलोचनात्मक विश्वसनीयता और बढ़ सकती थी।
इसके बावजूद ‘बेड़ियों को तोड़ने की सज़ा’ सामाजिक असमानता को उसके वास्तविक आधारों से जोड़कर देखने का आग्रह करता है। इसकी कविताएँ पूछती हैं कि श्रम करने वाला सम्मान से वंचित क्यों है, जाति अवसरों को क्यों प्रभावित करती है और बराबरी की माँग सत्ता के लिए असुविधाजनक क्यों बन जाती है। संग्रह की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि कवि अन्याय को नियति मानने से इनकार करता है। कविता पाठक को उस समाज के सामने खड़ा करती है, जहाँ समानता की घोषणा और समानता का वास्तविक अनुभव अब भी दूर-दूर हैं। बेड़ियाँ शरीर पर हों या विचारों में, उन्हें पहचानना ही उन्हें तोड़ने की शुरुआत है। यही इस पुस्तक का केंद्रीय साहित्यिक और सामाजिक आग्रह है।
– मनोज अभिज्ञान
पुस्तक का नाम :
बेड़ियों को तोड़ने की सजा, (कविता संग्रह)
रचनाकार: संतोष पटेल
कौटिल्य बुक्स, नई दिल्ली 2026

