नर्मदा का पानी पर्याप्त, फिर भी इंदौर में जल संकट की आशंका

इंदौर

:: विशेषज्ञ बोले- पानी की कमी से ज्यादा बड़ी समस्या कुप्रबंधन; 2057 की जरूरतों को ध्यान में रखकर बनानी होगी जल नीति ::
इंदौर । औसत से कम वर्षा और लगातार गिरते भूजल स्तर के बीच इंदौर में जल संकट की आशंका बढ़ रही है। शहर में नर्मदा परियोजना और बोरिंग से प्रतिदिन करीब 435 मिलियन लीटर पानी उपलब्ध होने के बावजूद वितरण लगभग 243 मिलियन लीटर ही होने का दावा किया गया है। पानी की उपलब्धता और वितरण के इस अंतर पर विशेषज्ञों ने सवाल उठाते हुए कहा कि जल संकट से निपटने के लिए केवल नए स्रोत तलाशना पर्याप्त नहीं है, बल्कि मौजूदा जल संसाधनों का बेहतर प्रबंधन भी जरूरी है। यह बात स्टेट प्रेस क्लब, मप्र द्वारा अभिनव कला समाज सभागार में आयोजित जल संकट से जल सुरक्षा विषयक परिचर्चा में सामने आई।
भारत सरकार के पेयजल मिशन के निदेशक एवं भूवैज्ञानिक सुधीन्द्र मोहन शर्मा ने कहा कि इंदौर की अपनी कोई नदी नहीं है और शहर नर्मदा जल पर निर्भर है। 75 वर्ष पहले कुएं-बावड़ियां जल संग्रहण के प्रमुख स्रोत थे। बाद में 30 से 75 फीट की गहराई पर पानी उपलब्ध हो जाता था, लेकिन अब भूजल स्तर हजार फीट तक पहुंचना गंभीर स्थिति है।
उन्होंने कहा कि इंदौर को 2027 नहीं, बल्कि 2057 की जरूरतों को ध्यान में रखकर जल प्रबंधन की योजना बनानी होगी। इसके लिए भूजल स्तर का नक्शा तैयार करने, शहर में 15 स्थानों पर लगाए गए पीजोमीटर की नियमित निगरानी और फ्लोमीटर लगाने की जरूरत है। केंद्रीय भूजल बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार शहर में केवल आठ प्रतिशत स्थानों पर बेहतर भूजल पुनर्भरण की संभावना है। उन्होंने बताया कि नगर निगम की प्रस्तावित जल नीति में नागरिक भी अपने सुझाव दे सकते हैं।
:: 54 प्रतिशत आबादी को मिलता है नर्मदा जल, बाकी टैंकरों पर निर्भर ::
एसजीएसआईटीएस के सिविल इंजीनियरिंग विभागाध्यक्ष प्रो. डॉ. संदीप नरुलकर ने कहा कि इंदौर की 54 प्रतिशत आबादी को नर्मदा जल मिलता है, जबकि शेष आबादी बोरिंग और टैंकरों पर निर्भर है। निगम के अनुसार नर्मदा परियोजना से प्रतिदिन 360 मिलियन लीटर और बोरिंग से करीब 75 मिलियन लीटर पानी लिया जाता है, लेकिन वितरण लगभग 243 मिलियन लीटर ही बताया जा रहा है। उन्होंने सवाल उठाया कि उपलब्ध पानी का शेष हिस्सा कहां जा रहा है। उन्होंने लीकेज और पानी की बर्बादी रोकने के साथ निजी हाइड्रेंट, टैंकर सेवाओं और कार वॉश सेंटरों के लिए स्पष्ट नीति बनाने पर जोर दिया। उनके अनुसार जनवरी और फरवरी के बाद मार्च में जल संकट की असली चुनौती सामने आ सकती है।
:: 35 इंच बारिश का संग्रहण हो तो 16 माह की जरूरत पूरी ::
पर्यावरणविद् डॉ. दिलीप बाघेला ने कहा कि इंदौर जिले में औसतन होने वाली 35 इंच वर्षा का सुनियोजित संग्रहण किया जाए तो करीब 16 माह तक पानी की जरूरत पूरी की जा सकती है। उन्होंने जंगलों की कटाई और पर्यावरण असंतुलन को जल संकट का प्रमुख कारण बताते हुए पेड़ों के संरक्षण की अपील की। उन्होंने प्रत्येक व्यक्ति से रोजाना 10 लीटर पानी बचाने का संकल्प लेने का आह्वान किया। कम वर्षा का असर ग्रामीण क्षेत्रों में फसलों पर भी पड़ रहा है।
देवी अहिल्या विश्वविद्यालय की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. उपासना गुप्ता ने घरेलू उपयोग में पानी की बचत करने और अनुपयोगी पानी का इस्तेमाल पेड़-पौधों की सिंचाई में करने का सुझाव दिया।
परिचर्चा की अध्यक्षता करते हुए स्टेट प्रेस क्लब के अध्यक्ष प्रवीण खारीवाल ने कहा कि जल संकट से निपटने के लिए अभी से योजनाबद्ध तैयारी और ठोस नीति जरूरी है। जल केवल मनुष्य ही नहीं, पशु-पक्षियों और पेड़-पौधों के जीवन के लिए भी आवश्यक है। सामाजिक कार्यकर्ता किशोर कोडवानी ने भी जल के कुप्रबंधन पर चिंता जताते हुए समय रहते प्रभावी कदम उठाने की जरूरत बताई।
प्रारंभ में परिचर्चा संयोजक राजू घोलप, पंकज क्षीरसागर, प्रवीण जोशी, विजय खंडेलवाल, सुनीता श्रीवास्तव, डॉ. मनीष दवे और नीलेश कांठेड ने अतिथियों का स्वागत किया। संचालन उमेश पारेख ने किया तथा आभार सुनील जैन ने माना। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में पर्यावरणविद्, सामाजिक कार्यकर्ता और गणमान्य नागरिक उपस्थित थे।