मन के झरोखे से बतियाती कविताएँ
आदरेया सुश्री रजनी सिंह जी का सद्यः प्रकाशित कविता-संग्रह ‘मेरी 101 कविताएँ’ हमारे सम्मुख अपनी उपस्थिति दर्ज़ करा चुका है। काव्य तो उनकी साँसों में रचा-बसा जान पड़ता है। ‘मेघदूत-एक भावानुवाद’, ‘ज्ञान शिरोमणी विद्योत्तमा’, ‘प्रकृति कृति प्रकृति’, ‘हिन्दी साहित्य का काव्यात्मक इतिहास’ जैसी अनेकों महत्त्वपूर्ण काव्य-कृतियों की जननी रजनी जी हिन्दी राजभाषा के प्रचार-प्रसार हेतु अनेक देशों का भ्रमण कर चुकी हैं।
रजनी जी ने अपना यह कविता-संग्रह महान कवि संसार को समादृत भाव से समर्पित किया है। अपनी संस्कृति, सभ्यता और सुसंस्कारों के यह बीज देख लेखिका के प्रति मन में प्रेम और आदर का भाव उमड़ पड़ता है। मंगलाचरण के रूप में पुस्तक का आरम्भ ‘हे सरस्वती माँ वंदन अभिनंदन, चरण पखारूँ, शीश नवाऊँ करूँ दीप अर्पण…रजनी द्वार खड़ी कर जोड़े स्वीकारो अर्चन’ से होता है। ईश की कृपा को स्वीकारती हुई वो लिखती हैं-‘प्रभु कृपा रच डाली अब तक, बत्तीस कृतियाँ रच पचकर…आभारी हूँ सफ़ल यज्ञ है, जिनके वचनों से फलदायक, रचूँ रचनाएँ और सरस्वती कृपा करें वरदायक’। बाबरे मन की चर्चा करते हुए वो लिखती हैं-‘मन के पीछे हुई बाबरी निर्गुण रूप नकारा, कृष्ण दिवानी व्यथित गोपियाँ सगुन रूप स्वीकारा/मन की दशा वही समझे बीती जिस पर हो, राधा रानी कृष्ण सखी जीवन न्यौछावर हो’।
बढ़ती हुई महँगाई पर उनकी ये पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं-‘आनन्द को लीला मुँह फाड़ती महँगाई ने,पेट्रोल डीजल रसोई गैस जेब कटाई ने/कहाँ जाएँ किससे कहें सही नहीं है, तेज़ी की लहर से परिवार क्षुब्ध है/कुछ तो उपाय जनहित में करना है,सहना तो असहनीय कुछ न कहना है’। समाज में चारों ओर फैले भ्रष्टाचार से रूबरू कराती ये पंक्तियाँ देखिए-‘नीयत हुई ख़राब डाँवाडोल,मानव बना दानव बेमोल,प्रथम सीढ़ी भ्रष्टाचार यही, अनुभव तुला पर गुनी कही/चारों तरफ़ एक सी स्थिति, शासन प्रशासन एक समान, विरोध शिकायत की यदि, समझो डूबी नाव मय प्रान/सभी विभाग में चलन यही, भ्रष्टाचार दिखाता ठेंगा, आओ दे जाओ सुविधा शुल्क, दोनों ख़ुश और न कुछ पंगा’। पर्यावरण पर भी अच्छी कविताएँ हैं-‘आओ वृक्ष लगाएँ सब मिल, पर्यावरण को शुद्ध बनाएँ, भूल हुई जो हमसे अब तक, वृक्ष रोपकर हरित कराएँ/सावधान अब खाओ कसम, संरक्षित वन पर्वत नदिया, भारत का बच्चा खड़ा रखेगा, आच्छादित वृक्षों से बगिया’।
प्रभात के दृश्य को जीवंत करती यह पंक्तियाँ सुन्दर बन पड़ी हैं-‘शुभ प्रभात मध्यम उजियारा, दिनकर उदय स्वर्णिम नज़ारा, पूर्व दिशा में उत्सव न्यारा/चहुँ ओर हुलसित दिनचर्या,भिन्न अभिन्न आकर्षण जाल, धन वैभव पूजन अर्चनर्या’। देखिए इन पंक्तियों में दीपावली कैसे जगमगा उठी है-‘दीपों की बारात सजी,टिमटिम ज्योति दमकी/दीपावली पर्व महिमा,राम सिया वसुधा झलकी/आई दीपावली उत्सव पावन, दुल्हन रूप निरखता/लक्ष्मी गणेश आशीर्वाद, रजनी आँचल खिलता’।
इसके अतिरिक्त तमाम सामयिक विषयों को शब्दों में बाँधते हुए रजनी जी खुद के अंतर्मन के गवाक्ष खोलती चली गई हैं। सरल सहज भाषा में लिखी ये कविताएँ उनके जीवन के अनुभवों का सार हैं, जो हर किसी के लिए न केवल पठनीय बल्कि उपयोगी भी सिद्ध हो सकती हैं। उनकी यह यात्रा सतत् चलती रहे और नित नए इतिहास रचे, उनको हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ देते हुए श्री राजेन्द्र राजन जी की इन पंक्तियों के साथ हम अपनी वाणी को विराम देते हैं: ‘मैं गुलों के साथ काँटे चुन रहा हूँ आजकल/ज़िन्दगानी का बिछौना बुन रहा हूँ आजकल/इक परिन्दा हूँ कहीं रुकना मेरी फ़ितरत नहीं/फ़िर किसी मंज़िल का सपना बन रहा हूँ आजकल।’
डा. सारिका मुकेश
एसोसिएट प्रोफेसर एवं हेड
अंग्रेजी विभाग
वी.आई.टी. यूनिवर्सिटी
वेल्लोर-632 014
(तमिलनाडु)
मोबाइल: 81241 63491
पुस्तक का नाम-मेरी 101 कविताएँ
लेखक-सुश्री रजनी सिंह
प्रकाशन-ए.आर.पब्लिशिंग कंपनी, दिल्ली-110032
संस्करण-2021
मूल्य-200/-रू, पृष्ठ-136