तुमसे सारी रौनकें

ज़ीस्त की शीरीनियों से 

दूरियाँ रह जाएँगी

बिन तुम्हारे महज़ मुझ में 

तल्ख़ियाँ रह जाएँगी

वक़्त-ए-रुख़सत अश्क के 

गौहर लुटाएँगी बहुत

सूनी सूनी चश्म की फिर 

सीपियाँ रह जाएँगी

रेत पर लिख कर मिटाई है 

जो तुमने मेरे नाम

ज़ेहन में महफ़ूज़ ये सब 

चिट्ठियाँ रह जाएँगी

मौसिक़ी सी हैं तेरी बातें 

मगर कल मेरे साथ

गुफ़्तगू करती हुई 

ख़ामोशियाँ रह जाएँगी

एक घर हो घर में तुम हो 

तुमसे सारी रौनकें

मेरे इन ख़्वाबों की इक दिन 

किरचियाँ रह जाएँगी

इश्क़ मेरा है मजाज़ी 

या हक़ीक़ी उंस है

बाद मेरे उलझी सारी 

गुत्थियाँ रह जाएँगी

‘आरज़ू’ थी हो मुकम्मल 

शख़्सियत मेरी मगर

तुमको खो कर मुझमें 

कितनी ख़ामियाँ रह जाएँगी

अंजुमन ‘आरज़ू’

छिंदवाड़ा-म0प्र0