जब किसी स्त्री के माथे पर,
लाल बिन्दी सजती है तो वह
और भी सुन्दर हो जाती है।
उसके चेहरे का नूर उसकी,
खूबसूरती में चार-चांद लगा देता है।
जब एक स्त्री पाणिग्रहण के समय
थामती है किसी अजनबी का हाथ,
तो वह ताउम्र उसके लिए समर्पित हो
जाती है और वह उसका सबसे,
प्यारा जीवन साथी हो जाता है।
खुले गेशुओं के साथ अठखेलियां
करने वाली लड़की जब सम्हालती
है पहली बार अपने सिर पर आंचल
तो उसे अपनी जिम्मेदारियों का
भान होता है और लग जाती है
उन्हें बड़े ही मनोयोग से सम्हालने।
जब पहली बार वह अपने ससुराल
आती है तो अल्हड़ लड़की से,
बन जाती है शुद्ध घरैतिन
अन्नपूर्णा बन रसोई सम्हाल लेती है।
लक्ष्मी बन खुशियों से भर देती है सारा घर,
इतना सब कुछ के बाद वह
याद करती है कि पता नहीं बाबूजी
ने सही से भोजन किया कि नहीं,
मां ने उन्हें बाल बनाने के लिए ,
कंघी-शीशा दिया कि नहीं।
मां यह कहना पक्का भूल गई होगी,
आते समय दादी की दवा लेते आना।
फिर सोचती है कि मां भी क्या याद
रखेगी,वह तो खुद सबके लिए करती है
और अपने लिए तो समय ही नहीं
निकाल पाती।
चिन्ता से आतुर रोती है फिर जब
बाबूजी अम्मा साथ होते हैं तो
हाल-चाल जानने के लिए फोन लगाती है,
उधर से बाबूजी की रुआंसी आवाज सुनकर,
रो पड़ती है और हंसते हुए कहती है
कि मैं तो बहुत खुश हूं,अपना ख्याल रखना।
इसी तरह वह अपनी गृहस्थी में रम जाती है।
स्त्री जब पहली बार मां बनती है
तब उसे सच्चा आभास होता है कि
अम्मा -बाबू जी ने कितनी कठिनाई से पाला,
जब वह अपने बच्चे की जिद पूरी करती है
तब उसे पता चलता है कि कैसे अम्मा-बाबू
जी ने अपनी इच्छाओं का होम हम
लोगों की इच्छाओं की पूर्ति के लिए किया।
स्त्री तब उस लाल बिन्दी को एक टक
निहारते हुए सोचती है कि तुम्हारे,
आने से मैं कितना बदल गई,
तुम्हारे कारण बहुत से नए रिश्ते मिले,
प्रेम, सम्मान मिला, सुन्दर परिवेश मिला
फिर अपनी लाल बिन्दी को नि
अनुपम चतुर्वेदी जी,संतकबीर नगर
उत्तर प्रदेश