यादों की पगडंडियाँ

 “लौटे कदम जब “

यादों की पगडंडियो   में

एक बुंद  सहसा उछली 

मन के सागर में, 

बह चला आज मन मेरा 

यादों की पगडांडियों में |

कुछ फूलीं फली और 

कुछ दब गईं वहीं ,

कुछ ने किया मुखर स्वर अपना 

कुछ रहीं चुप चाप खड़ी ,

मेरे  अबोध मन की 

आशाये तपस्विनी बैठी मिली ,

लौटे कदम जब 

यादौं की पगडंडियों में |

कौन है जो संभाले इनको 

करता नहीं मुक्त टुटने बिखरने को ,

चीऱती हुई स्मृति के तम को  

उकसा देतीं हैं मैरे मन को ,

भटकता है मन अधूरी 

आशाओं की नगरी में 

लौटे कदम जब 

यादौं की पगडंडियों में |

होजायें जो पुरी 

आशाऐ कहां फिर रह जाती हैं ,

ये भी  अपने अस्तित्व 

खोने को डरती हैं |

मचा देती हैं जब तब तूफान 

मिला न जिनको प्रभामय आसमान |

भटकती हैं अाज भी मेरे मन अन्तः तल में ,

लौटे कदम जब यादौं की पगडंडियों में |

                            अंबिका शर्मा