ख़ामोशी की दीवारों के पीछे,
गूंजती हैं हज़ारों चीखें।
सन्नाटा शोर मचाए यूँ,
वीराना कहर सा ढाए क्यों?
हवाएं जोर से बहती हैं,
सारे राज़ वो कहती हैं।
हर ज़र्रे में अरमान दफ़न,
एहसासों ने पहना हो कफन।
कैसा मरघट सा यह घरौंदा,
किस ने है विश्वास को रौंदा।
सिसकियाँ आवाज़ लगाती हैं,
मौन को साज़ बनाती हैं।
उदासी मुस्कान ओढ़ती है,
नीरवता चुप्पी तोड़ती है।
उन बंद दरवाज़ों के पीछे,
आँसुओं से आस को सींचे।
वो न जाने क्या क्या सहती है…
खामोशियाँ सब कुछ कहती है।
दीप्ति खुराना
मुरादाबाद-उत्तर प्रदेश