बंदासिंह बहादुर… शौर्य, साहस और बलिदान की मूर्ति –

:: सीखों के धर्म योद्धा ने एक बार फिर देशभक्ति के पल याद कराए ::
:: पटियाला के 25 रंगकर्मियों ने लालबाग के परिसर को जोश से भर कर दिया ::
:: पंजाबी ग्रुप के समूह ने तलवारबाजी का किया प्रदर्शन ::
इन्दौर । 700 साल की गुलामी को बंदासिंह बहादुर ने न केवल खत्म किया बल्कि पंजाब में मुगलों को जुल्म को खत्म करने में सीखों के साथ-साथ आम लोगों को युद्ध से जोड़ा। पंजाब में मुगलों का राज इन्हीं की बदौलत खत्म हुआ और छोटी सी उम्र में देश भक्ति के पथ पर चलते हुए बंदा बहादुर शहीद हो गए। पटियाला की टीम ने इन्दौर को एक नई सौगात देते हुए पंजाब के शौर्य से परिचित कराया। हिंदू आध्यात्मिक एवं सेवा मेले के दुसरे दिन रात 8 बजे से टीम द्वारा प्रस्तुति शुरू की गई जो पूरे दिन की थकान को मिटाते हुए ऊर्जा से ओतप्रोत कर गई। नाटक में तलविंदरसिंह ने बंदा बहादुर के मुख्य किरदार को बखूबी निभाया। बहादुर शाह और फारूख शाह का किरदार राजेश शर्मा ने अदा किया। इनकी डायलाग अदायगी और जोश देखकर ठंड के माहौल में गर्मी घूल गई। पगड़ी लगाए हाथों में तलवार थामे जब 15 सीखों का समूह तलवार बाजी कर रहा था तो दर्शक दीर्घा में बैठे दर्शक खुद को बोले सो निहाल सतश्रीकाल का जयघोष करने से नहीं रोक पाए। आमतौर पर भारत की आजादी ने भगतसिंह के किरदार को याद रखा जाता है लेकिन बंदासिंह बहादुर ने पंजाब को मुगलों से आजाद कराने में जो भूमिका अदा की है वह इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं। आज इन्दौर ने उस इतिहास को रूबरू मंचित हुआ देखा। हिन्दू आध्यात्मिक एवं सेवा संस्थान के चेयरमेन विनोद अग्रवाल, अध्यक्ष राधेश्याम शर्मा, सचिव विनोद बिड़ला एवं प्रचार प्रमुख जवाहर मंगवानी ने बताया कि बंदा बहादुर के हौंसले और जुनून की जरूरत आज की जनरेशन को भी हैं। सच्चाई, देशभक्ति, वीरता और त्याग के मार्ग पर चलते हुए जिस तरह से उन्होंने अपने देश और कौम के लिए युद्ध किया वह युवाओं के लिए प्रेरक हैं। शहर में इस तरह के आयोजन समय-समय पर आयोजित होने चाहिए। मनजीत गर्ग के अनुसार सीख समुदाय अपने इस वीर बहादुर को समय-समय पर याद करके कई प्रकार से सलामी देता रहता है। माधवदास बैरागी के नाम से जाने वाले बंदा बहादुर ने सोनीपत की लड़ाई, जलालबाग की लड़ाई, भीलोवाल की लड़ाई जैसे युद्ध में अपना जौहर मनवाया था बल्कि उन्होंने जमींदारी व्यवस्था को समाप्त करने और भूमि के किसानों को संपत्ति के अधिकार दिलाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। मूगलों ने उनके उस साहस को खत्म करने के लिए यातना देकर उन्हें मौत के घाट उतार दिया था। लालबाग परिसर में नाट्य रूपातरण के दौरान महत्वपूर्ण पलों का चित्रण कलाकारों ने साकार किया और खूब तालियां बटोरी।
:: यह भी रहे मुख्य किरदार में ::
लालबाग पैलेस में मंचित हुए बंदासिंह बहादुर के नाटक में चंदन बलोच ने वजीर खान, रेवेन थटी ने मुगल सरदार, जशनदीप ने बाजसिंह का किरदार निभाया एवं पूरे नाटक के सूत्रधार हरविंदर सिंह पाल थे। पंजाबी साहित्य अकादमी भोपाल एवं मध्यप्रदेश शासन संस्कृति विभाग के सहयोग से यह आयोजन किया गया था।
:: बैरागी बन गए थे बंदा सिंह बहादुर, गुरु गोविंद सिंह ने दी खालसा की कमान ::
भारतवर्ष में एक से बढ़कर एक योद्धा हुए हैं, जिनमें से अधिकतर के बारे में हमारे पाठ्य पुस्तकों में कुछ नहीं मिलता। योद्धा और संत बंदा सिंह बहादुर उनमें से ही एक हैं, जिनकी कहानी में न सिर्फ सिख खालसा की वीरता, बल्कि मुगलों की क्रूरता की भी दास्ताँ है। 15 वर्ष की उम्र में ही संन्यास ग्रहण करने वाले ‘लक्ष्मण दास’ ने लगभग दो दशक ‘माधव सिंह बैरागी’ के रूप में बिताया। गोदावरी नदी के किनारे स्थित नांदेड़ में उन्होंने अपना आश्रम स्थापित किया था। सन् 1670 के अक्टूबर में जन्मे बंदा सिंह बहादुर को ये नाम खालसा में शामिल होने के बाद मिला। हालाँकि, गुरु गोविंद सिंह ने उनका नाम ‘गुरबख्श सिंह’ रखा था। सन् 1708 में गुरु गोविंद सिंह ने बंदा सिंह बहादुर के आश्रम जाकर उनसे मुलाकात की थी, जिसके बाद बंदा सिंह बहादुर उनके शिष्य बन गए। खालसा में आते-आते ही बंदा सिंह बहादुर ने पंजाब के पटियाला में स्थित मुगलों की प्रांतीय राजधानी समाना पर नियंत्रण स्थापित कर इस्लामी आक्रांताओं में हडक़ंप मचा दिया।