चीनी प्रोफेसर जियांग की भविष्यवाणी बोले- लंबा संघर्ष अमेरिका के लिए घातक साबित होगा

अंतरराष्ट्रीय

बीजिंग । अमेरिका और ईरान के बीच जारी सैन्य टकराव अब अपने 14वें दिन में प्रवेश कर गया है, और युद्ध की यह स्थिति लगातार जटिल होती जा रही है। नवीनतम रिपोर्टों के अनुसार, खाड़ी क्षेत्र में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों को इस संघर्ष में अपेक्षा से अधिक प्रतिरोध और नुकसान का सामना करना पड़ा है। इस बीच, चीनी विद्वान जियांग शियुकिंग द्वारा की गई एक पुरानी भविष्यवाणी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गहन चर्चा का विषय बन गई है, जिसमें उन्होंने इस संघर्ष के लंबे समय तक खिंचने और अमेरिका के लिए रणनीतिक रूप से नुकसानदेह साबित होने का दावा किया था।
जियांग शियुकिंग ने दो वर्ष पहले अपने विश्लेषण मंच ‘प्रेडिक्टिव हिस्ट्री’के माध्यम से तीन प्रमुख अनुमान लगाए थे। उनकी पहली भविष्यवाणी डोनाल्ड ट्रंप की सत्ता में वापसी और दूसरी अमेरिका-ईरान के बीच बड़े सैन्य टकराव को लेकर थी। अब जब ये दोनों बातें सच साबित होती दिख रही हैं, तो उनकी तीसरी भविष्यवाणी को लेकर विश्लेषण तेज हो गया है। जियांग का मानना है कि यदि यह युद्ध होता है, तो अमेरिका को इसमें अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाएगी। जियांग के अनुसार, यह संघर्ष किसी पारंपरिक युद्ध की तरह जल्दी समाप्त होने वाला नहीं है। उन्होंने ईरान की रणनीति की तुलना साठ के दशक के वियतनाम युद्ध से की है। जिस तरह वियतनाम में अमेरिका सैन्य क्षमता की कमी से नहीं, बल्कि लंबे समय तक चले संघर्ष और उससे उत्पन्न राजनीतिक व आर्थिक दबावों के कारण कमजोर पड़ा था, ठीक वैसी ही स्थिति यहाँ बन सकती है। ईरान की रणनीति सीधे टकराव के बजाय अपने विरोधी को आर्थिक और सैन्य रूप से थकाने की हो सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आज ईरान के पास उन्नत बैलिस्टिक मिसाइलें, ड्रोन तकनीक और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियां मौजूद हैं, जो उसे वियतनाम से कहीं अधिक घातक बनाती हैं। इसके अलावा, होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर ईरान का नियंत्रण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बड़ा खतरा है। यदि इस मार्ग में बाधा आती है, तो इसका असर केवल क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था, व्यापार और खाद्य आपूर्ति पर भी पड़ेगा। जियांग शियुकिंग के विश्लेषण का मुख्य आधार यह है कि आधुनिक युद्ध केवल युद्धक्षेत्र की सैन्य शक्ति से नहीं, बल्कि समय, आर्थिक संसाधनों और राजनीतिक सहनशक्ति से तय होते हैं। उनके अनुसार, यदि यह संघर्ष लंबा चलता है, तो इसका परिणाम अचानक सैन्य हार के रूप में नहीं, बल्कि धीरे-धीरे राजनीतिक प्रतिष्ठा में गिरावट और रणनीतिक लक्ष्यों को हासिल न कर पाने के रूप में सामने आ सकता है। यही कारण है कि उनका यह आकलन वर्तमान अंतरराष्ट्रीय राजनीति और सामरिक गलियारों में चर्चा का केंद्र बना हुआ है।