इंदौर। जिले तथा उससे लगे ग्रामीण एवं वन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर पेड़ों की अवैध कटाई का मामला सामने आया है। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार ईंधन और लकड़ी की बढ़ती मांग के बीच नीम, पीपल, बरगद, आम, गोंदी, सहजन (सुरजना), बबूल सहित कई महत्वपूर्ण प्रजातियों के हजारों पेड़ काटे जा रहे हैं। इनमें से अधिकांश पेड़ नदी-नालों, तालाबों के किनारों, चरनोई भूमि तथा अन्य सार्वजनिक स्थानों पर स्थित थे, जो पर्यावरणीय संतुलन के लिए आवश्यक थे, मिट्टी के कटाव को रोकते थे और साथ ही भूजल संचयन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे।
प्राप्त जानकारी के अनुसार यह कटाई संगठित और व्यावसायिक स्तर पर की जा रही है। पेड़ों को मशीनों से काटकर उनके छोटे-छोटे टुकड़े किए जाते हैं और बाद में परिवहन के लिए सार्वजनिक स्थानों, तालाबों के किनारों, सड़कों के आसपास तथा कच्चे रास्तों पर अस्थायी रूप से जमा कर दिया जाता है, जिससे कार्रवाई से बचा जा सके। इसके बाद यह लकड़ी विभिन्न माध्यमों से शहर तक पहुंचाई जा रही है।
इंदौर जिला पहले ही वन क्षेत्र में लगातार कमी और विकास परियोजनाओं के लिए बड़े पैमाने पर वृक्ष कटाई का दंश झेल रहा है। लाखों पेड़ों की कटाई के बाद भी उनके स्थान पर पर्याप्त वृक्षारोपण और संरक्षण सुनिश्चित नहीं हो पाया है। ऐसे में ग्रामीण और वन क्षेत्रों में हजारों पेड़ों की नई कटाई पर्यावरणीय संतुलन, भूजल संरक्षण और जैव विविधता के लिए गंभीर खतरा बन गई है।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार खुड़ैल क्षेत्र के निकट गोगाखेड़ी तालाब के आसपास, कनाड़िया क्षेत्र के बेगमखेड़ी तालाब, कनाड़िया-सेमल्याचाऊ मार्ग, बुरानाखेड़ी, खाती पिपलिया, बारोदा करा, सेमल्याचाऊ आदि गांवों से देवास जिले की सीमा तक बड़ी मात्रा में कटी हुई लकड़ियों के ढेर देखे जा सकते हैं। इन क्षेत्रों में पेड़ों की कटाई के स्पष्ट संकेत होने के बावजूद अब तक कोई बड़ी कार्रवाई सामने नहीं आई है। यह सब मुख्य मार्गों और सड़कों के पास स्थित है, और जब यहां पेड़ों की ऐसी दुर्दशा हो रही है, तो आंतरिक क्षेत्रों की क्या हालत होगी, यह आसानी से समझा जा सकता है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब भारी मशीनों की मदद से इतने बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई और लकड़ी का परिवहन किया जा रहा है, तब संबंधित विभागों को इसकी भनक क्यों नहीं लगी? वन विभाग, जिला प्रशासन और पंचायत स्तर के जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका पर भी प्रश्नचिह्न खड़े हो रहे हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि क्षेत्र में तैनात अमला और निगरानी तंत्र या तो पूरी तरह निष्क्रिय है या फिर इस गतिविधि को रोकने में विफल साबित हुआ है।
पर्यावरण प्रेमियों और ग्रामीणों ने प्रशासन से तत्काल संयुक्त जांच दल गठित कर मामले की जांच कराने, अवैध कटाई में शामिल लोगों की पहचान करने तथा प्रभावित क्षेत्रों में संरक्षण और पुनर्वनीकरण की ठोस योजना लागू करने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई, तो आने वाले वर्षों में क्षेत्र की हरियाली, जल स्रोतों और वन्यजीवों पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।


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