कोलकाता,(ईएमएस)। पश्चिम बंगाल चुनाव के बाद से तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) पर संकट के बादल गहराते जा रहे हैं। सोमवार को संकट में एक नया अध्याय जुड़ गया, जब टीएमसी के 20 बागी सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला को नेशनल सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में विलय का प्रस्ताव सौंप दिया। इस कदम से टीएमसी के भीतर राजनीतिक हलचल और तेज हो गई है।
इस गहमागहमी के बीच, टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी, जो दिल्ली में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की पूछताछ का सामना कर रहे थे, एक अप्रत्याशित स्थिति में फंस गए। रिपोर्टों के अनुसार, लोकसभा अध्यक्ष के कार्यालय से ममता बनर्जी के समर्थन वाले सांसदों को 4 बजे ओम बिड़ला से मिलने के लिए एक ईमेल भेजा गया। चूंकि अभिषेक पूछताछ के दौरान बिना मोबाइल फोन या लैपटॉप के थे, उन्हें इस तत्काल संदेश की भनक तक नहीं लगी।
ईमेल मिलने के करीब एक घंटे बाद टीएमसी सांसद कीर्ति आजाद को लोकसभा स्पीकर का फोन आया। कीर्ति तुरंत स्पीकर से मिलने पहुंचे और उन्हें अभिषेक की स्थिति के बारे में बताया। टीएमसी सांसद आजाद ने लोकसभा अध्यक्ष बिड़ला से आग्रह किया कि अभिषेक को जांच में सहयोग करने और अपनी बात रखने के लिए कोई और समय दिया जाए। हालांकि, उन्हें नया समय दिया गया है या नहीं, यह अभी स्पष्ट नहीं है।
लोकसभा अध्यक्ष बिड़ला ने पूरे मामले पर दोनों पक्षों की बातें सुनने के बाद ही कोई निर्णय लेने की बात कही है। सूत्रों के मुताबिक, अध्यक्ष इस मुद्दे पर कानूनी राय भी ले सकते है। यह अनुमान है कि बागी सांसदों की मांग पर कोई भी फैसला संसद के मानसून सत्र से पहले किया जाएगा, जो सामान्यतः जुलाई के तीसरे सप्ताह में शुरू होता है। यह निर्णय केंद्रीय विधि मंत्रालय की लिखित राय के आधार पर लिया जाएगा, ताकि यदि फैसले को अदालत में चुनौती दी जाए, तब यह न्यायिक जांच की कसौटी पर खरा उतर सके।
इस बीच, संवैधानिक विशेषज्ञों ने दलबदल विरोधी कानून की 10वीं अनुसूची के पैरा-4 का हवाला देकर कहा है कि केवल एक राजनीतिक दल ही दूसरे राजनीतिक दल में विलय कर सकता है, न कि व्यक्तिगत सांसद या विधायक इसतरह से विलय कर सकते है। निर्वाचन आयोग के एक पूर्व अधिकारी ने भी टीएमसी के बागी सांसदों की एनसीपीआई में विलय की इस योजना को एक नया प्रयोग करार दिया है, जिसकी मौजूदा कानूनों में स्पष्ट व्यवस्था नहीं है।

