-1983 में नागरिकता……1980 की मतदाता सूची में नाम दर्ज
नई दिल्ली । कांग्रेस की राज्यसभा सदस्य सोनिया गांधी से जुड़े महत्वपूर्ण मामले में, राउज एवेन्यू कोर्ट में 25 जुलाई को अंतिम सुनवाई करेगी। यह मामला बिना भारतीय नागरिकता हासिल किए कथित तौर पर मतदाता सूची में नाम दर्ज करने और जालसाजी से जुड़ा हुआ है। सोनिया गांधी के खिलाफ दायर पुनरीक्षण (रिवीजन) याचिका पर सुनवाई टलने के बाद नई तारीख तय की गई है, जहां कांग्रेस नेता सोनिया गांधी के वकील ने अदालत में अपनी लिखित दलीलें दाखिल कीं। पिछली सुनवाई में कोर्ट ने दोनों पक्षों को अपनी-अपनी लिखित दलीलें प्रस्तुत करने का निर्देश दिया था।
वकील विकास त्रिपाठी द्वारा दायर पुनरीक्षण याचिका में दावा है कि सोनिया गांधी ने 30 अप्रैल, 1983 को भारतीय नागरिकता हासिल की थी, जबकि उनका नाम वर्ष 1980 की मतदाता सूची में दर्ज था। याचिकाकर्ता ने सवाल उठाया है कि 1980 में उनका नाम किस आधार पर शामिल हुआ, और 1982 में इस नाम को मतदाता सूची से क्यों हटाया गया। याचिका में आरोप लगाया गया है कि यदि उन्होंने 1983 में नागरिकता प्राप्त की थी, तब 1980 में मतदाता सूची में नाम दर्ज करने के लिए कौन से दस्तावेज प्रस्तुत किए गए थे और क्या इसके लिए कथित तौर पर फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल हुआ था।
इसके पहले, मजिस्ट्रेट कोर्ट ने सोनिया गांधी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग वाली शिकायत को खारिज किया था। मजिस्ट्रेट कोर्ट ने तर्क दिया था कि न्यायपालिका ऐसी जांच शुरू नहीं कर सकती जिससे संवैधानिक अधिकारियों को सौंपे गए क्षेत्रों में अनुचित अतिक्रमण हो, और यह संविधान के अनुच्छेद 329 के तहत चुनावी मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप को सीमित करता है। हालांकि, एक पूर्व आदेश में, राउज एवेन्यू कोर्ट के विशेष न्यायाधीश (भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम) विशाल गोगने ने पुनरीक्षण याचिका की जांच करने पर सहमति जताकर सोनिया गांधी के साथ-साथ दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी किया।
पुनरीक्षण याचिका का विरोध कर सोनिया गांधी ने अदालत को बताया है कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोप राजनीतिक रूप से प्रेरित, निराधार और गलत एवं भ्रामक तथ्यों पर आधारित हैं। अपने जवाब में, उन्होंने स्पष्ट किया कि नागरिकता से संबंधित प्रश्न पूरी तरह से केंद्र के अधिकार क्षेत्र में आते हैं, जबकि मतदाता सूचियों से संबंधित विवाद भारत के चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में हैं। उन्होंने जोर दिया कि जालसाजी या धोखाधड़ी के आरोपों को साबित करने के लिए कोई विश्वसनीय दस्तावेजी सबूत पेश नहीं किया गया है, और उन्होंने पूरी कार्यवाही को कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग करार दिया है।

