आधार के जनक नंदन नीलेकणि अब परीक्षा सुधारों के सूत्रधार

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नई दिल्ली । देश में सरकारी पहचान से लेकर कल्याणकारी योजनाओं के लाभ तक, करोड़ों भारतीयों के जीवन को बदलने वाले आधार प्रोजेक्ट के पीछे जिस शख्स का दिमाग था, नंदन नीलेकणि, एक बार फिर चर्चा में हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें नीट पेपर लीक के बाद परीक्षा व्यवस्था में सुधारों के लिए गठित उच्च-स्तरीय टास्क फोर्स का प्रमुख बनाया है। इस घोषणा के बाद लोगों के मन में फिर वहीं सवाल है कि आखिर नीलेकणि कौन हैं और सरकार ने उन पर इतना बड़ा भरोसा क्यों जताया? नंदन मोहनराव नीलेकणि ने आईआईटी बॉम्बे से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की और 1981 में एन.आर. नारायण मूर्ति के साथ मिलकर इंफोसिस की सह-स्थापना की। उन्होंने कंपनी को वैश्विक पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभाई और 2002 से 2007 तक इंफोसिस के सीईओ व मैनेजिंग डायरेक्टर रहे।
कॉर्पोरेट की दुनिया से परे, सार्वजनिक प्रशासन में उनका सबसे बड़ा योगदान 2009 में आया। तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उन्हें कैबिनेट रैंक के साथ भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) का पहला अध्यक्ष बनाया। नीलेकणि ने दुनिया के सबसे बड़े बायोमैट्रिक पहचान तंत्र आधार को सफलतापूर्वक स्थापित किया, जो आज भारत के डिजिटल प्रशासन की रीढ़ है। एक अरब से अधिक लोगों तक सरकारी योजनाओं का सीधा लाभ पहुंचाने और पहचान का सत्यापन आसान बनाने में आधार की भूमिका अतुलनीय है। इसके अलावा, यूपीआई (यूपीआई) जैसी डिजिटल पेमेंट क्रांति के शुरुआती तकनीकी ढांचे को बढ़ावा देने में भी उनका बड़ा हाथ था।
परीक्षाओं में बार-बार पेपर लीक और धांधली से पैदा हुए अविश्वास को खत्म करने के लिए मोदी सरकार को एक इसतहर के विशेषज्ञ की तलाश थी, जो विशाल पैमाने पर डिजिटल सिस्टम खड़ा कर सके। राष्ट्रीय स्तर पर डिजिटल प्लेटफॉर्म बनाने का उनका अनुभव अद्वितीय है। प्रधानमंत्री मोदी का मानना है कि जिस शख्स ने आधार जैसी दुनिया की सबसे बड़ी डिजिटल पहचान प्रणाली को खड़ा किया, वह परीक्षा प्रणाली को भी सुरक्षित, पारदर्शी और तकनीक आधारित बनाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
यह फैसला तब समय आया है जब सरकार सार्वजनिक परीक्षा अधिनियम, 2024 में संशोधन कर कानूनी शिकंजा कसने और सख्त सजा का प्रावधान करने की तैयारी में है। हालांकि यह टास्क फोर्स क्या सिफारिशें देगी और सुधारों का खाका कैसा होगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है, लेकिन देश की नजरें एक बार फिर नीलेकणि पर टिक गई हैं। उनका रिकॉर्ड बताता है कि बड़े लक्ष्य सिर्फ योजनाओं से नहीं, मजबूत सिस्टम और साफ विजन से पूरे होते हैं। अब देखना होगा कि जिस तरह आधार ने भारत की पहचान बदल दी, क्या उसी तरह परीक्षा व्यवस्था में भी कोई बड़ा बदलाव देखने को मिलता है।