मिथ्या वचन, विष वमन और चरित्र हनन: ज़ुबान ही साम्राज्यों की कब्र खोदती है

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By ओंकारेश्वर पांडेय

नई दिल्ली | 26 जुलाई 2026: तमिलनाडु के युवा मुख्यमंत्री जोसेफ विजय ने हाल ही में अपने समर्थकों और डिजिटल वॉरियर्स को एक स्पष्ट हिदायत दी—”सोशल मीडिया पर विचार रखते समय भाषा का संयम न खोएं।” 

दुनिया भर में इस पहल का स्वागत हो रहा है। स्वागत इसलिए नहीं कि यह कोई चुनावी जुमला है, बल्कि इसलिए कि आज पूरी दुनिया भाषा की गंद से ऊब चुकी है। जब राजनीति दूसरों को नीचा दिखाने के लिए ज़ुबान को हथियार बनाती है, तो उसका अंत भी बेहद खौफनाक होता है।

मिथ्या वचन, विष वमन और चरित्र हनन! 

मिथ्या वचन, विष वमन और चरित्र हनन – इन तीनों का एक साथ इस्तेमाल पहले दौर में सामने वाले को डरा देता है। कि अरे कुछ बोलेंगे, तो हमें गालियां देंगे, देशद्रोही बता देंगे। और इसके बीच अपना झूठ फैलाकर समाज को धर्म या समुदायों में बांटकर अपनी राजनीति चला लेंगे। यह अंग्रेजी हुकूमत की उस सुविचारित योजनाबद्ध रणनीति का ऐसा पहलू था कि इसने विभिन्न समाजों को पहले डराया, एक दूसरे के प्रति मिथ्या प्रचार कर परस्पर विष-वमन के शाब्दिक हथियार दिये और इस कदर चरित्र हनन किया कि लोग तथ्यों को जांचने और सोचने समझने की तर्क शक्ति भूलकर हत्याएं तक करना धार्मिक और राष्ट्रभक्ति का परम कर्तव्य समझने लगे। 

इन तीनों पहलुओं की अपनी त्रासदी जनमानस में प्रचलित है कि आसमान पर थूकने से वह खुद के मुख पर गिरता है। यह दोनों बातें आज यथार्थ रुप में सामने आ रही हैं। 

‘शुचिता’ का दावा और बड़बोलेपन से पतन

शुचिता और नैतिकता की राजनीति का दावा करने वालों की ट्रोल आर्मी ने अपशब्दों का इतना इस्तेमाल किया कि आज उनकी अपनी राजनीति ही संकट में घिर गई है। यकीन न हो तो चुनावी नतीजों का निष्पक्ष विश्लेषण करके देख लीजिए।

2019 के चुनाव में प्रचंड बहुमत से 303 सीटें पाने वाली भारतीय जनता पार्टी 2024 में 63 सीटें गिरकर 240 पर क्यों आ गिरी? नारा तो 400 पार का था। वहीं दूसरी तरफ, लगातार गालियां सहने और राजनीतिक नुकसान उठाने के बावजूद कांग्रेस 52 से बढ़कर 99 सीटों पर कैसे पहुंच गई?

कांग्रेस को भी अतीत में अपने कुछ नेताओं के बिगड़े बोल का भारी नुकसान उठाना पड़ा है। लेकिन इसके मूल में भी ‘व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी’ के माध्यम से सत्ता समर्थकों द्वारा फैलाई गई गालियों, झूठ और विष-वमन का वही लंबा इतिहास रहा है। केंद्रीय मंत्रियों से लेकर मुख्यमंत्रियों तक की भाषा ने पूरी संवैधानिक गरिमा को तार-तार कर दिया। 

2024 के चुनाव में भाजपा को अकेले केवल 23.6 करोड़ वोट मिले और पूरा एनडीए मिलाकर 28.3 करोड़। यानी लगभग 70 करोड़ मतदाता एनडीए के बाहर रहे। जब बहुसंख्यक मतदाता विपक्ष में हों और उन्हें लगातार “राष्ट्रद्रोही”, “रामद्रोही”, “अर्बन नक्सल” कहा जाए, तो यह स्वाभाविक है कि समाज में असंतोष और आंदोलन की ऊर्जा और भी तेज़ हो जाती है।  

एक शब्द “काक्रोच” से शुरू हुआ छात्र आंदोलन इस बात का प्रतीक है कि अपमानजनक भाषा और रोज़ाना की गालियाँ युवाओं में गहरी बेचैनी और गुस्सा भर रही हैं। 

राजनीति की ज़रूरत बताकर आईटी सेल के अनपढ़ों ने इंटरनेट पर इतनी गंदगी फैलाई कि उसका खामियाज़ा अब पूरे तंत्र को भुगतना पड़ रहा है। तमाम बड़े नेता चुप रहे। अब भुगत रहे। 

भाषा की मर्यादा की ज़िम्मेदारी सबकी है, पर सबसे पहले सत्ता की है, साधु की है, और उस सनातन परंपरा के पालन का दावा करने वाले की है जो ‘सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात्’ का पाठ तो भूल ही गयी, और यहां तक कि “अप्रियं सत्यं न ब्रुयात” की चेतावनी भी। 

पहले था – मुंह में राम, बगल में छूरी – अब हो गया मुंह में छूरी बगल में राम 

प्रभु श्रीराम को हम ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ कहते हैं। समूचे रामायण में उनके मुख से कोई अपशब्द, मिथ्या वचन या विष-वमन नहीं मिलता। वे अपने शत्रुओं से भी मर्यादा में रहकर बात करते थे।

इसीलिए राम मंदिर के उद्घाटन के समय संघ प्रमुख मोहन भागवत ने स्पष्ट कहा था कि केवल मंदिर बनाना काफी नहीं है, हमें राम की मर्यादा का पालन भी करना होगा। पर सत्ता के नशे में कौन सुनता है? पर उनकी चुप्पी उनके सारे नैरेटिव पर भारी पड़ गयी।मौनं स्वीकृति लक्षणं। 

एक तरफ मर्यादा की बातें हुईं, तो दूसरी तरफ चंदा चोरी और सीनाजोरी की शिकायतें आम हुईं। Yogi की SIT रिपोर्ट में जितना दर्ज हुआ, उससे कहीं ज्यादा छुपाया गया।

नागपुर से लेकर सेवा सदन तक, आईटी सेल के झूठ और बदबूदार बयानों का असर यह हुआ कि जहां संगठन को अपने सौ साल (1925-2025) का भव्य जश्न मनाना था, वहां उनकी सामाजिक साख और पहचान पर सवाल उठ रहे हैं।

जिस तरह केंद्रीय मंत्रियों की विफलताओं के पाप पर बड़े नेताओं की चुप्पी ने सरकार को संकट में डाला, उसी तरह ट्रोल्स के विष-वमन और चरित्र-हनन पर भाजपा संघ के बड़े नेताओं की मौन-सहमति ने उनकी नैतिक साख को मिट्टी में मिला दिया। 

राष्ट्र द्रोही, राम द्रोही और देश द्रोही? 

ये तीन शब्द किसी भी गाली से बढ़कर हैं। घनघोर घृणा और नफ़रत पैदा करने वाले। हर बात पर राष्ट्र द्रोही, राम द्रोही और देश द्रोही को भाजपा ब्रिगेड ने अपने राजनीतिक संवाद का ऐसा हथियार बनाया, खुलेआम टीवी डिबेट तक में इस्तेमाल किया कि इससे देश आहत हुआ और कथित सद विचार व शुचिता की धोती गंदी और राजनीति मैली होती गयी। युवा आक्रोश में आया। काक्रोच जनता पार्टी आहूत छात्रों के देशव्यापी आंदोलन में भाषा की मर्यादा टूट गयी। मैं इसकी निंदा करता हूं। भाषा की मर्यादा रखनी चाहिए। पर युवा छात्र छात्राओं ने इतनी गालियां क्यों दीं। यह भी समझना जरूरी है। क्योंकि वाट्सएप यूनिवर्सिटी ने बेतहाशा विष-वमन किया।‌ आम बोलचाल में देश द्रोही, और राम द्रोही कहना एक चलन हो गया। यह सबसे बड़ी गाली थी। इसका अधिकार किसने दिया! क्या युवाओं ने जहर के इलाज के लिए जहर का उपयोग किया? 

हर आलोचक को अर्बन नक्सल कहना 

भाजपा समर्थकों ने तब से सबको अर्बन नक्सल कहना शुरू किया, जब खुद मोदी ने अपने भाषण में इसका इस्तेमाल किया। पर सबसे अहम ये है कि अपने आलोचकों और कांग्रेस समेत सभी विपक्षी दलों को अर्बन नक्सल बताने वाली भाजपा के नेता यह नहीं बताते कि सत्ता की पहली सीढ़ी वे वाम दलों के कंधे पर रखकर चढ़े।‌ दिल्ली के नगर निगम चुनाव में लाल कृष्ण आडवाणी ने कम्युनिस्ट पार्टी के साथ लिखित समझौता किया था। यह अकाट्य सत्य है। तो पहला नक्सल कौन हुआ। 

कांग्रेस पर चोरी के इल्ज़ाम झूठे साबित हुए, पर माफी नहीं मांगी 

सत्ता में आने के लिए भाजपा ने झूठे आरोपों की झड़ी लगाई। फेक न्यूज़ का सहारा लिया। नेहरू-गांधी से लेकर राहुल गांधी तक पर तमाम मिथ्या वचन और विष-वमन का सहारा लिया। इतना जोर से “चोर चोर” चिल्लाई, मीडिया ने भी साथ दिया, कि डॉ मनमोहन सिंह की सरकार को नकार कर जनता ने भाजपा को मौका दे दिया। क्योंकि उनको लगा कि आप सच बोल रहे हैं। आपने कामनवेल्थ गेम्स घोटाला,‌ टूजी स्कैम, कोयला घोटाला,‌ नेशनल हेराल्ड जैसे बड़े आरोप लगाए। लेकिन सभी में कांग्रेस बरी हो गयी, क्योंकि आरोप झूठे थे।‌ पर भाजपा माफी मांगना तो दूर आज भी ये आरोप परोक्ष रुप से लगाती है। 

और इसी ‘चोर चोर’ के शोर में भाजपा ने अपने ऊपर लगे घोटालों की लंबी श्रृंखला को छुपा लिया। व्यापम घोटाला, इलेक्टोरल बॉन्ड घोटाला, सेबी-अडानी, चंदा चोरी और वोट चोरी तो महज टिप्स हैं। फेहरिस्त लंबी है। 

विदेशी व घरेलू कूटनीति

कथनी और करनी का भयानक दोहरापन 

यह मिथ्या राजनीति सिर्फ भाषा तक सीमित नहीं रही, इसने हमारी नीतियों को भी हास्यास्पद बना दिया:

कपड़ों से पहचान बनाम सौगात-ए-ईद: मंचों से समर्थकों को उकसाने के लिए कहा जाता है कि “उन्हें कपड़ों से पहचानो”, और दूसरी तरफ खुद कहा जाता है कि “मेरे घर तो ईद की सेवैयां उन्हीं के घर से आती थीं।” फिर 30 लाख मुसलमानों को ‘सौगात-ए-ईद’ भेजी जाती है और अभिनेताओं से उसके समर्थन में ट्वीट कराए जाते हैं।

अंतरराष्ट्रीय विदेश नीति का विरोधाभास:

पाकिस्तान से दुश्मनी का ढिंढोरा पीटा जाता है, लेकिन उससे भी ज्यादा कट्टर तालिबान के आगे कूटनीतिक दोस्ताना दिखाया जाता है।

ईरान, जिसने ऐतिहासिक रूप से ‘सिंधु’ को ‘हिंदू’ पुकारा, उससे दूरियां बनाई जाती हैं और उन अरब देशों से पेंग बढ़ाई जाती है जो पाकिस्तान के हमदर्द रहे हैं। जब हमारे भारत में वेद लिखे जा रहे थे, तब ईरान में उससे मिलता-जुलता जेंड अवेस्ता। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरान के साथ सभ्यतागत मित्रता बताती और खुद उसके धुर विरोधी इजराइल के पास चले गए। यह कूटनीति का बैलेंस नहीं था। देश के संप्रभु और निष्पक्ष होने की वैश्विक मर्यादा और हमारे भारत के प्रति दुनिया के विश्वास को आघात था। और फिर हम उस संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब से दोस्ती निभाते हैं। जिस सऊदी अरब ने पाकिस्तान के साथ सैन्य गठजोड़ किया है, उसमें एक दूसरे पर हमला करने वाले को साझा दुश्मन माना गया है। यानी अब कभी हमने कोई आपरेशन पाकिस्तान के खिलाफ किया, तो चीन के अलावा एक और देश हमारे खिलाफ खड़ा मिलेगा। 

अमेरिका लगातार मंचों से बेइज्जती करता रहे, और हम उसके राष्ट्रपति को ‘एक्सीलेंसी’ कहकर हाथ जोड़ते रहें और उनके पाले में बैठकर पूरी दुनिया से अलग-थलग पड़ जाएं। यह कूटनीति का ऐसा दुखद प्रहसन है, जिसके कारण दुनिया की मीडिया भी हमारा मजाक बना रही है और हमें गंभीरता से लेना बंद कर दिया है। मेलोडी राजनीति ने मोदी को दुनिया भर में अनफ्रेंड कर दिया। 

यह सब उस ‘मिथ्या राजनीति’ के उदाहरण हैं, जो जनता को भ्रमित करने के लिए भाषा और नैरेटिव का खेल खेलती है।

महाभारत के ‘चीर-हरण’ से लेकर ‘व्यंग्य’ तक: जब ज़ुबान ने कौरव वंश की बलि ले ली

हमारी पौराणिक परंपराएं और महाकाव्य चीख-चीखकर चेतावनी देते हैं कि अभद्र भाषा और चरित्र-हनन से बड़ा कोई विनाशक नहीं है।

महाभारत का महासमर:

कौरवों का पतन केवल ज़मीन के टुकड़े के कारण नहीं हुआ था, उसकी नींव ज़ुबान के अहंकार और चरित्र-हनन पर रखी गई थी। द्युत सभा में द्रौपदी का ‘चीर-हरण’ किया गया और कर्ण व दुशासन ने उनके लिए अत्यंत अपमानजनक शब्दों का प्रयोग कर चरित्र-हनन किया। कौरवों को लगा कि वे द्रौपदी को नीचा दिखाकर अपनी ताकत दिखा रहे हैं, लेकिन वही ‘शब्द-बाण’ पूरे कौरव वंश के विनाश का कारण बन गए। छात्रों के आंदोलन में महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार देश को शर्मसार कर गया। पर कोई माफी नहीं? सीजेआई को भरी अदालत में जूता और गाली?और प्रधानमंत्री खामोश! 

शास्त्रों का स्पष्ट संदेश हम भूल गए:

श्रीमद्भगवद्गीता (17.15) में भगवान श्रीकृष्ण ‘वाक्-तप’ (वाणी की शुचिता) की परिभाषा देते हैं:

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।

यानी”जो वाणी किसी के मन में भय या द्वेष पैदा न करे, जो सत्य, प्रिय और हितकारी हो—वही वाणी का असली तप है।”

पंचतंत्र में पंडित विष्णु शर्मा साफ चेतावनी देते हैं कि-

रोहते सायकैर्विद्धं वनं परशुना हतम्। 

वाचा दुरुक्तं दुरुक्तं न रोहति रोहति॥

यानी “कुल्हाड़ी से काटा गया जंगल और बाणों से घायल शरीर फिर ठीक हो सकता है, लेकिन अभद्र भाषा और चरित्र-हनन की ज़ुबान से लगा घाव कभी नहीं भरता।”

ईस्ट इंडिया कंपनी और ट्रंप: विष-वमन का वैश्विक मॉडल

इतिहास गवाह है कि ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत पर राज सिर्फ बंदूकों के दम पर नहीं, बल्कि भारतीय समाजों के बीच परस्पर झूठ और विष-वमन फैलाकर किया। औपनिवेशिक अभिलेखों (Hobson-Jobson कोश) में दर्ज है कि कैसे ब्रिटिश अफसर भारतीयों का चरित्र-हनन करने के लिए अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल करते थे। 

ट्रंप ने मोदी को “calm, cool, and a total killer” और “tough as a killer” बताया। हालाँकि इसे ‘तारीफ़’ कहा गया, पर ‘किलर’ शब्द का प्रयोग किसी विश्व नेता के लिए कितना सभ्य है, यह प्रश्नचिह्न है। इससे भी बदतर, ट्रंप ने एक निजी लंच में मोदी के बारे में कहा: “Prime Minister Modi came to see me, ‘Sir, may I see you please’. Yes.” — यानी भारत के प्रधानमंत्री को अपने सामने झुकता हुआ दिखाने की कोशिश। और २०२६ में तो उन्होंने भारत को ‘HELLHOLE’ कहा — एक पूरे देश का अपमान! परिणाम क्या हुआ? आज ट्रंप दुनिया में अलग-थलग पड़ गये हैं। 

रोमन राजनीति में जब ‘invective’ (अपमानजनक वक्तृत्व) को “a way to convince the audience and reach political goals” यानी गाली देने को एक राजनीतिक हथियार बनाया, तो वह ढह गया! सिसेरो ने अपने विरोधियों पर “ethnic slurs, mockery, ridicule, sarcasm and other forms of ad hominem/ad personam attacks” का इस्तेमाल किया, पर अंत बुरा हुआ। 

मुग़ल दरबार की भाषा ‘अदब’ और ‘तेहज़ीब’ का प्रतीक थी। लेकिन जब यहां विलासिता और अभद्र व्यंग्य को स्वीकार किया जाने लगा तो तख्त की चमक फीकी पड़ गई। अंग्रेज़ों ने इस आंतरिक कमज़ोरी का फ़ायदा उठाया और खुद गाली को ‘शासन’ का हथियार बनाया। 

दरअसल यह उस राजनीति का‌ हिस्सा है, जो शुरुआत में तो सफल दिखता है, पर जल्द ही अपनी पूरी राजनीति, रणनीति और वैचारिक आदर्शों को अपने ही हाथों ध्वस्त कर लेता है। 

रोम के पतन पर इतिहासकार एडवर्ड गिब्बन ने ठीक ही लिखा था—”जब सीनेट के भीतर कानून और मर्यादा का सम्मान खत्म होकर गाली-गलौज में बदला, तो महान रोमन साम्राज्य ढह गया।”

बात साफ है। ज़ुबान संभाले बिना कोई साम्राज्य नहीं बचता

चाहे द्वापर का कौरव साम्राज्य हो, सीज़र का रोम हो, या आज की कोई सर्वशक्तिमान सरकार—जब-जब सत्ता और उसके समर्थकों ने ज़ुबान से ज़हर उगला है, तब-तब जनता ने उन्हें उनकी सही जगह दिखाई है।

जो लोग सोचते हैं कि गालियों के दम पर या ट्रॉल आर्मी के बल पर वे अमर हो जाएंगे, वे इतिहास से बेखबर हैं। आज — ‘पोइज़निंग द वेल’ (कुएँ में ज़हर घोलना) की रणनीति — दुनिया भर की राजनीति में अपने वैचारिक वजूद को स्वयं समाप्त कर रही है। 

मोहम्मद अली जिन्ना ने जब अपने भाषणों में कांग्रेस और गांधी पर तीखे हमले किए, उन पर “misrepresentation and vilification” का आरोप लगाया, तब एक ब्रिटिश अखबार ने उनके भाषण को “BITTER SPEECH” कहा था, जबकि उसमें ‘अभद्रता’ का उल्लेख नहीं था। 

शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद विपक्ष के नेता श्री राहुल गांधी ने कहा कि “लड़ाई दो विचार धाराओं की है – गोड्से और गांधी की।” 

सारी दुनिया गांधी को मानती है। विश्व के तमाम बड़े नेता, यहां तक कि नाज़ी जर्मनी के नेता भी गांधी की समाधि पर आये, किसी ने नहीं कहा कि गोड्से को श्रद्धांजलि देनी है। दुनिया हिंसा नहीं, शांति और सद्भाव के पक्ष में खड़ी है। भाषाई मर्यादा तो प्रभु श्रीराम की वाणी में है।‌ नहीं तो राम नाम सत्य है। 

विजय जोसेफ का कड़ा संदेश: मर्यादा ही असली ताकत है

इसी ‘गाली-राजनीति’ के जहरीले माहौल में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने वह किया, जो बड़े-बूढ़ों ने नहीं किया। उन्होंने अपनी डिजिटल सेना को ‘वर्चुअल वॉरियर्स’ का दर्जा दिया, पर शर्त रखी — “जब लोग हमारी आईटी विंग की बात करें, तो वे कहें कि यह अत्यंत सभ्य और गरिमामयी है।”

देश भर के युवाओं को जोसेफ विजय की सलाह माननी चाहिए—यह एक उम्मीद की किरण है। 

विजय ने समझ लिया है कि गाली देना ताकत नहीं, वैचारिक कमज़ोरी का सबूत है। जब भाषा की मर्यादा टूटती है, तो रिश्तों का व्यवहार टूटता है। व्यवहार टूटता है, तो नीतियां गटर में बह जाती हैं।

मशहूर कहावत है—”Great minds discuss ideas; average minds discuss events; small minds discuss people.” (महान लोग विचारों पर चर्चा करते हैं, सामान्य लोग घटनाओं पर, और छोटे मन वाले लोग व्यक्तियों के चरित्र-हनन पर।

बधाई मुख्यमंत्री विजय जोसेफ! आपने यह साबित किया कि असली नेतृत्व ज़ुबान से जहर उगलने में नहीं, बल्कि मर्यादा का पालन करने में है! 

लेखक परिचय: ओंकारेश्वर पांडेय 40 वर्षों के अनुभव वाले वरिष्ठ पत्रकार, जननीति सलाहकार एवं रणनीतिकार हैं। संपर्क (व्हाट्सएप): +91 093112 40119