न्याय व्यवस्था में करुणा, पुनर्वास और गरिमा को केंद्र में रखने का आह्वान

इंदौर

:: न्यायमूर्ति विक्रम नाथ बोले – ‘कारागार के द्वार पर न्याय समाप्त नहीं होना चाहिए’; बंदियों को कैदी नहीं, इंसान के रूप में देखने की जरूरत ::
इंदौर । न्याय व्यवस्था का उद्देश्य केवल सजा देना नहीं, बल्कि व्यक्ति की गरिमा, अधिकार और समाज में सम्मानजनक पुनर्वापसी सुनिश्चित करना भी है। कारागार के द्वार पर न्याय समाप्त नहीं होना चाहिए। बंदियों, रिहा हुए बंदियों और उनके परिवारों को विधिक सहायता, पुनर्वास और समाज में पुनर्समावेशन का अवसर मिलना चाहिए। यह बात सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश एवं राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (नालसा) के कार्यपालक अध्यक्ष न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने इंदौर में आयोजित दो दिवसीय सम्मेलन के दूसरे एवं अंतिम दिन कही।
सम्मेलन का दूसरा दिन बाल-मित्रवत न्याय, बच्चों के संरक्षण एवं पुनर्वास तथा कारागार से परे न्याय, पुनर्वास और समाज में पुनर्समावेशन जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर केंद्रित रहा। विभिन्न सत्रों में न्याय व्यवस्था को अधिक मानवीय, समावेशी और समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने पर विचार-विमर्श हुआ।
:: बंदी को केवल कैदी नहीं, इंसान के रूप में देखें ::
द्वितीय तकनीकी सत्र की अध्यक्षता करते हुए न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने कहा कि अभिरक्षा में रह रहे व्यक्ति के लिए न्याय तक पहुंच केवल लंबित प्रकरण में विधिक प्रतिनिधित्व उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं हो सकती। विधिक जागरूकता, समयबद्ध विधिक उपचार, विधिक सहायता, कारागार लोक अदालत, परिवार का सहयोग, पुनर्वास और समाज में सम्मानजनक पुनर्समावेशन – ये सभी न्याय के व्यापक स्वरूप का हिस्सा हैं।
उन्होंने कहा कि कारागार की दीवारों के पीछे मौजूद व्यक्ति को केवल बंदी के रूप में नहीं, बल्कि एक मनुष्य के रूप में देखा जाना चाहिए। बंदियों की गरिमा और अधिकारों की रक्षा के साथ उनके परिवारों की समस्याओं का समाधान भी मानवीय और प्रभावी न्याय व्यवस्था की जिम्मेदारी है।
सत्र में नालसा-स्पृहा योजना, 2025 के प्रभावी क्रियान्वयन पर भी जोर दिया गया। इसके साथ विधिक स्वयंसेवकों, विधिक सेवा संस्थाओं और कारागार लोक अदालतों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया गया।
:: रिहाई के बाद भी जारी रहे न्याय का साथ ::
सत्र में कहा गया कि न्याय की प्रक्रिया कारावास के साथ समाप्त नहीं होती। रिहाई के बाद परिवार का सहयोग, शिक्षा, कौशल विकास, आजीविका के अवसर, समुदाय की भागीदारी और मानसिक कल्याण ऐसे आधार हैं, जो व्यक्ति को सम्मानपूर्वक जीवन पुनर्निर्माण और समाज में लौटने में मदद करते हैं।
न्यायमूर्ति नाथ की अध्यक्षता में हुई चर्चा में इस बात पर जोर दिया गया कि न्याय व्यवस्था व्यक्ति से कारावास के दौरान, रिहाई के समय और समाज में पुनर्स्थापित होने तक जुड़ी रहे। इसी समग्र दृष्टिकोण से पुनर्वास और पुनर्समावेशन को न्याय की निरंतर प्रक्रिया का हिस्सा बनाने पर बल दिया गया।
:: बच्चों के लिए संवेदनशील हो न्याय व्यवस्था ::
सम्मेलन के प्रथम तकनीकी सत्र की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति एस.सी. शर्मा ने की। इसमें बच्चों के लिए बाल-मित्रवत विधिक सेवाओं की योजना के प्रभावी क्रियान्वयन तथा संरक्षण, विधिक सहायता, पुनर्वास और गरिमा सुनिश्चित करने वाली बाल-केंद्रित न्याय व्यवस्था को मजबूत करने पर चर्चा हुई।
संवेदनशील बच्चों की समय पर पहचान, जमीनी स्तर तक विधिक सेवाओं की पहुंच और न्यायपालिका, विधिक सेवा संस्थाओं तथा बाल संरक्षण से जुड़े प्राधिकरणों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता बताई गई। पॉक्सो मामलों में बाल-मित्रवत एवं पीड़ित-केंद्रित दृष्टिकोण, प्रभावी विधिक प्रतिनिधित्व, क्षतिपूर्ति, मनोसामाजिक सहयोग और पुनःआघात से संरक्षण पर भी जोर दिया गया।
:: न्याय अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे ::
सम्मेलन के समापन पर साझा दृष्टिकोण सामने आया कि न्याय तक पहुंच केवल न्यायालय कक्ष तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। गरीबी, सामाजिक असुरक्षा, भौगोलिक दूरी, कारावास या जागरूकता के अभाव जैसी बाधाओं के कारण कोई व्यक्ति न्याय से वंचित न रहे।
सम्मेलन में जागरूकता, विवाद समाधान, विधिक प्रतिनिधित्व, संरक्षण, पुनर्वास और पुनर्समावेशन को न्याय तक पहुंच की निरंतर प्रक्रिया के रूप में देखा गया। मध्यस्थता, समुदाय आधारित विवाद समाधान, जनजातीय एवं वन समुदायों का विधिक सशक्तीकरण, बाल-मित्रवत न्याय और कारागार विधिक सेवाओं को इसके महत्वपूर्ण स्तंभ बताया गया।
:: हिंदी, सांकेतिक भाषा और ब्रेल में पहुंचे विधिक ज्ञान ::
सम्मेलन में यह भी रेखांकित किया गया कि वास्तविक न्यायिक पहुंच के लिए कानूनी जानकारी की पहुंच जरूरी है। इसके लिए हिंदी, भारतीय सांकेतिक भाषा, ब्रेल और अन्य समावेशी माध्यमों में विधिक जानकारी उपलब्ध कराने की आवश्यकता बताई गई।
समापन संबोधन में न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने भारत के मुख्य न्यायाधीश, सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों, अतिथियों, न्यायिक अधिकारियों, विधिक सेवा संस्थाओं के प्रतिनिधियों और प्रतिभागियों के योगदान के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने मध्यप्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा सम्मेलन के सफल आयोजन तथा विधिक सेवाओं के क्षेत्र में किए जा रहे नवाचारों की सराहना की।
सम्मेलन का समापन इस संकल्प के साथ हुआ कि न्याय केवल उपलब्ध नहीं, बल्कि सुलभ, सुबोध, समावेशी और गरिमापूर्ण हो तथा समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे।