सुरक्षा परिषद में भारत को मिलेगा वीटो पॉवर? पुतिन यूएनएससी पर भड़के

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-वर्तमान में सुरक्षा परिषद का ढांचा 1945 की परिस्थितियों पर आधारित है
नई दिल्ली । रूस के राष्ट्रपति व्लादमीर पुतिन एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका को सुरक्षा परिषद में शामिल करने की बात करते हैं तो अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के विश्लेषक इसे सीधे तौर पर भारत की स्थाई सदस्यता के समर्थन के रूप में देख रहे हैं। एशिया से भारत आज ना केवल दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है बल्कि आर्थिक और सामरिक दृष्टि से ग्लोबल साउथ का सबसे प्रभावी नेतृत्वकर्ता बनकर उभरा है। अब सवाल यह है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार क्यों अनिवार्य देखिए वर्तमान सुरक्षा परिषद का ढांचा 1945 की परिस्थितियों पर आधारित है। जहां केवल स्थाई सदस्यों के पास वीटो पावर है और पिछले आठ दशक में दुनिया पूरी तरह बदल चुकी है। पूरे अफ्रीकी महाद्वीप और लैटिन अमेरिका से एक भी स्थाई सदस्य नहीं है।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिअक दुनिया की 60फीसदी से अधिक आबादी एशिया में रहती है। फिर भी यहां से केवल एक स्थाई सदस्य है। समकालीन वैश्विक संकट युद्ध और मानवीय युद्ध को हल करने में मौजूदा ढांचा बार-बार अप्रभावी साबित हुआ है। वैसे भारत लंबे समय से जी4 भारत, जापान, जर्मनी, ब्राजील के जरिए सुधारों की मांग उठाता रहा है और सबसे बड़ी बात भारत के पक्ष में ठोस तर्क है।
संयुक्त राष्ट्र के इतिहास में शांति अभियानों में सबसे बड़ा सैन्य और मानवीय योगदान देने वाले देशों में भारत पहले नंबर पर रहा है। भारत ने हमेशा विकासशील देशों, ग्लोबल साउथ की प्राथमिकताओं जैसे खाद्य सुरक्षा, जलवायु न्याय और डिजिटल समावेशन को वैश्विक एजेंडे पर मजबूती से रखा है। ऐसे में पुतिन का बयान लैटिन अमेरिकी, अफ्रीकी और एशियाई देशों को शामिल करने का प्रस्ताव अपने आप में बहुत बड़ी बात है।
पुतिन के बयान का दूसरा सबसे अहम हिस्सा था। वैश्विक वित्तीय गवर्नेंस, आईएमएफ और वर्ल्ड बैंक जैसे संस्थान में वोटिंग अधिकार आज भी पश्चिमी देशों के पक्ष में झुके हैं। जो आज की आर्थिक वास्तविकताओं के अनुरूप नहीं है। ब्रिक्स देश अब स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और न्यू डेवलपमेंट बैंक जैसे तंत्रों के जरिए अधिक संतुलित और समावेशी वित्तीय प्रणाली तैयार करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। पुतिन का रुख साफ करता है कि मल्टीपोलर विश्व व्यवस्था की मांग अब केवल एक विचार नहीं बल्कि एक जरुरत बन गई है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या वर्तमान स्थाई सदस्य अपनी वीटो शक्ति और वर्चस्व को छोड़कर विकासशील देशों को उनके वाजिब हक देने के लिए तैयार होंगे?