पूर्वोत्तर भारत अंतर्राष्ट्रीय रेल कनेक्टिविटी के अहम केंद्र के रूप में उभरेगा

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भूटान, नेपाल और बांग्लादेश के साथ कई परियोजनाओं पर चल रहा काम
गुवाहाटी । पूर्वोत्तर अब सिर्फ देश के दूरस्थ हिस्सों को रेल नेटवर्क से जोड़ने की कवायद तक सीमित नहीं है, बल्कि भारतीय रेल इस क्षेत्र को पड़ोसी देशों के साथ व्यापार, पर्यटन और रणनीतिक संपर्क के एक बड़े केंद्र के रूप में विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। भूटान, नेपाल और बांग्लादेश के साथ रेल संपर्क मजबूत करने के लिए कई परियोजनाओं पर काम किया जा रहा है। इससे आने वाले सालों में पूर्वोत्तर भारत अंतर्राष्ट्रीय रेल कनेक्टिविटी के अहम केंद्र के रूप में उभर सकता है।
एनएफआर के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी ने बताया कि भारत की अंतर्राष्ट्रीय कनेक्टिविटी को मजबूत करने के लिए पड़ोसी देशों के साथ रेल संपर्क बढ़ाने पर विशेष जोर दिया जा रहा है। भूटान के साथ बनारहाट-सामत्से और कोकराझार-गेलेफू रेल परियोजनाओं को हाल ही में मंजूरी मिली है और इनके लिए भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। दोनों परियोजनाओं को 2029 तक पूरा करने का लक्ष्य है। इनके पूरा होने के बाद भारत और भूटान के बीच व्यापार और पर्यटन को नई गति मिलने की उम्मीद है।
रिपोर्ट के मुताबिक नेपाल के साथ भी रेल संपर्क को विस्तार किया जा रहा है। जोगबनी से विराटनगर के लिए कंटेनर ट्रेन चलाई जा चुकी है और इस संपर्क को आगे विस्तारित करने की दिशा में काम जारी है। वहीं, बांग्लादेश के साथ अगरतला-अखौरा रेल परियोजना का भौतिक निर्माण पूरा हो चुका है। महिषासन जीरो प्वाइंट पर भी काम अंतिम चरण में है और करीब 170 मीटर का काम शेष बताया गया है। इन परियोजनाओं से पूर्वोत्तर के लिए पड़ोसी देशों तक माल और यात्रियों की आवाजाही के नए रास्ते खुलने की संभावना है।
मिजोरम की राजधानी आइजोल तक पहली बार ट्रेन पहुंचना इस बदलाव की बड़ी उपलब्धियों में शामिल है। बैराबी-सैरांग परियोजना के जरिए पिछले साल 13 सितंबर को आइजोल को रेल संपर्क मिला। इसके बाद सिक्किम, मणिपुर और नागालैंड को रेल नेटवर्क से जोड़ने की परियोजनाओं पर भी तेजी से काम हो रहा है। रेलवे की योजना सेवोक-रंगपो परियोजना के जरिए 2027 तक सिक्किम को रेल नेटवर्क से जोड़ने की है। वहीं, 2028 तक मणिपुर की राजधानी इंफाल और 2029 तक नागालैंड को रेल नेटवर्क से जोड़ने का लक्ष्य रखा है। नागालैंड के मामले में यह बदलाव खास महत्व रखता है। एनएफआर के मुताबिक करीब 226 किलोमीटर लंबे एलीफेंट कॉरिडोर में एआई आधारित इंट्रूजन डिटेक्शन सिस्टम (आईडीएस) लगाया जा रहा है। यह प्रणाली रेलवे ट्रैक पर हाथियों की मौजूदगी का पता लगाकर समय रहते चेतावनी देने में मदद करती है, जिससे ट्रेन और वन्यजीवों के बीच टक्कर की घटनाओं को रोकने में सहायता मिलती है।
असम के हूलोंगापार वन्यजीव अभयारण्य में गिबन के संरक्षण के लिए रेलवे ट्रैक के ऊपर विशेष कैनोपी ब्रिज बनाए गए हैं। इन ब्रिज के जरिए गिबन सुरक्षित रूप से एक तरफ से दूसरी तरफ जा सकते हैं और उन्हें रेल लाइन पार करने के लिए जमीन पर उतरने की जरूरत नहीं पड़ती। एनएफआर के मुताबिक वर्तमान में करीब 73 हजार करोड़ रुपए की लागत वाली लगभग 20 बड़ी परियोजनाओं पर काम चल रहा है। चालू वित्त वर्ष में रेलवे को 11,488 करोड़ रुपए का बजट आवंटित किया गया है। रेलवे अधिकारियों के मुताबिक पूर्वोत्तर में कई परियोजनाओं को 2007 से 2010 के बीच मंजूरी मिली थी, लेकिन पर्याप्त बजट उपलब्ध नहीं होने के कारण उनकी रफ्तार धीमी रही।
इसके अलावा पश्चिम बंगाल के बालुरघाट-हिली रेल प्रोजेक्ट पर भी काम जारी है। पूर्वोत्तर में रेल विस्तार का असर केवल यात्री सुविधाओं तक सीमित नहीं रहने वाला है। पड़ोसी देशों के साथ रेल संपर्क बढ़ने से माल ढुलाई, व्यापार और पर्यटन को नए रास्ते मिल सकते हैं। इसके साथ ही सीमावर्ती क्षेत्रों में बेहतर कनेक्टिविटी सामरिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण होगी। रेलवे की मौजूदा परियोजनाओं और 2029 तक तय लक्ष्यों को देखते हुए आने वाले सालों में पूर्वोत्तर के रेल नेटवर्क में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। एक ओर जहां क्षेत्र की राजधानियां मुख्य रेल नेटवर्क से जुड़ेंगी, वहीं दूसरी ओर भूटान, नेपाल और बांग्लादेश के साथ बढ़ता रेल संपर्क पूर्वोत्तर को भारत की अंतर्राष्ट्रीय कनेक्टिविटी के एक महत्वपूर्ण गलियारे में बदल सकता है।