नई दिल्ली । केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के हालिया बयान ने यूनिफॉर्म सिविल कोड (यूसीसी) को लेकर राजनीतिक सरगर्मी बढ़ा दी है। शाह ने कहा है कि भाजपा-एनडीए शासित 21 राज्यों में 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले यूसीसी कानून लागू कर दिया जाएगा। हालांकि, इस घोषणा के तुरंत बाद भाजपा की सहयोगी जेडीयू ने बिहार में यूसीसी लागू करने से इनकार कर दिया। शाह ने तीन तलाक खत्म करने का उदाहरण देते हुए कहा कि मुस्लिम महिलाओं को समान अधिकार मिले हैं और अब यूसीसी भी लागू होगा। यह मुद्दा नया नहीं है, दरअसल, सुप्रीम कोर्ट पिछले चार दशकों से भी अधिक समय से यूसीसी की आवश्यकता पर जोर दे रहा है, लेकिन राजनीतिक नफा-नुकसान के चलते सरकारों ने इस पर खास ध्यान नहीं दिया।
यूसीसी का अर्थ है देश के सभी नागरिकों के लिए विवाह, तलाक, विरासत, गोद लेने जैसे सिविल मामलों में धर्म-आधारित पर्सनल लॉ की जगह एक समान कानूनी व्यवस्था। इसका संवैधानिक आधार अनुच्छेद 44 है, जो नीति-निर्देशक तत्वों में शामिल है, यानी इसे सीधे अदालत के जरिए लागू नहीं कराया जा सकता। कानून बनाना संसद या विधानसभाओं का काम है। बावजूद इसके, सुप्रीम कोर्ट ने कई बार सरकारों का ध्यान इस ओर खींचा है।
सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार 1985 के मोहम्मद अहमद खान बनाम शाह बानो बेगम मामले में यूसीसी की जरूरत पर जोर दिया था। यह फैसला मुस्लिम महिला के गुजारा भत्ता अधिकार से जुड़ा था और इसने यूसीसी को राष्ट्रीय राजनीति में एक प्रमुख संवैधानिक मुद्दे के रूप में स्थापित किया। इसके बाद, 1995 के सरला मुद्गल बनाम भारत सरकार मामले में कोर्ट ने फिर सरकार को याद दिलाया कि विवाह और उत्तराधिकार जैसे मामले धर्मनिरपेक्ष प्रकृति के हैं और अनुच्छेद 44 पर ‘फ्रेश तरीके से फैसला’ लेने को कहा। 2003 में जॉन वल्लमट्टम बनाम भारत सरकार और 2019 में जोस पाउलो कुटिन्हो बनाम मारिया लुइज वैलेंटिना पेरेइरा मामलों में भी सुप्रीम कोर्ट ने संसद को कॉमन सिविल कोड बनाने की दिशा में कदम उठाने का आग्रह किया। हालिया सुनवाई में भी कोर्ट ने महिलाओं के समान अधिकार सुनिश्चित करने के लिए यूसीसी को एक प्रभावी रास्ता बताया, लेकिन स्पष्ट किया कि इसे लागू करना विधायिका का ही काम है।
सवाल उठता है कि सुप्रीम कोर्ट के बार-बार कहने के बावजूद सरकारों ने इस पर कदम क्यों नहीं उठाए? इसकी मुख्य वजहें राजनीतिक संवेदनशीलता, अल्पसंख्यक समुदायों की आशंकाएं और यूसीसी का असल स्वरूप तय करने की जटिलता रही हैं। पर्सनल लॉ में बदलाव धार्मिक पहचान और सामाजिक परंपराओं से जुड़ा होने के कारण हमेशा एक संवेदनशील मुद्दा रहा है। सरकारों को डर रहा कि बिना पर्याप्त बातचीत के इसे लागू करने पर धार्मिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप के रूप में देखा जा सकता है। इसके अलावा, विभिन्न धर्मों के नियमों को एक समान कानून में ढालना अपने आप में एक बड़ी चुनौती है। राजनीतिक सहमति का अभाव भी एक बड़ी वजह रही है, जैसा कि अमित शाह के हालिया बयान पर जेडीयू का रुख दिखाता है।

