दीया दरबार

व्यंग

नगर का नाम दीपपुर था। नाम सुनते ही लगता था कि यहाँ अँधेरा नाम की कोई चीज नहीं होगी। लेकिन इस बार दीपपुर में अँधेरा बहुत था। फर्क सिर्फ इतना था कि अँधेरा गलियों, घरों और गरीबों के चेहरों पर था और रोशनी मुख्य चौक, सरकारी भवनों और नेताओं की तस्वीरों के आसपास।

बाढ़ आई थी। नदी ने अपना रास्ता छोड़ा नहीं था, बल्कि लोगों का रास्ता छोड़ दिया था। गाँवों में पानी था, घरों में पानी था, खेतों में पानी था और सरकारी दफ्तरों में फाइलें सूखी थीं। कुछ परिवार ऊँचे बाँध पर बैठे थे, कुछ स्कूलों में शरण लिए हुए थे और कुछ इस इंतजार में थे कि सरकार उन्हें राहत देगी या राहत का फोटो खिंचवाकर चली जाएगी।

इसी बीच राजधानी से शुभ समाचार आया।

प्रधानजी का जन्मदिन था।

देश में दीये जलाए जाएँगे।

यह खबर सुनकर दीपपुर के जिलाधिकारी बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने तत्काल बैठक बुलाई। बाढ़ की समीक्षा बैठक नहीं, दीया समीक्षा बैठक।

जिलाधिकारी ने पूछा, “कितने दीये जलेंगे?”

अधिकारी ने कहा, “सर, अभी संख्या तय नहीं है।”

“तो तय करो।”

“कितने?”

“जितने ज्यादा हों, उतना अच्छा।”

एक अधिकारी ने साहस करके कहा, “सर, बाढ़ में राहत की भी जरूरत है।”

जिलाधिकारी ने उसे ऐसे देखा जैसे उसने राष्ट्रीय भावना के बीच राशन की बोरी घुसा दी हो।

“राहत भी होगी।”

“कब, सर?”

“समय आने पर।”

“समय कब आएगा?”

जिलाधिकारी ने कहा, “पहले जन्मदिन आने दो।”

अधिकारी चुप हो गया। उसे समझ में आ गया कि सरकार में कुछ काम तारीख देखकर होते हैं और कुछ तस्वीर देखकर।

एक छोटे अधिकारी चतुरानंद बाबू ने पूछा, “सर, दीयों के लिए तेल कहाँ से आएगा?”

“बाजार से।”

“बजट?”

“व्यवस्था हो जाएगी।”

“और अगर कोई पूछे कि तेल का खर्च किस मद में हुआ?”

जिलाधिकारी ने कहा, “इसे खर्च मत कहो।”

“तो?”

“भावना कहो।”

चतुरानंद बाबू ने नोट कर लिया—तेल नहीं, भावना।

फिर उन्हें अचानक एक बात सूझी।

“सर, अगर जनता पूछे कि भावना कितने रुपये लीटर है?”

जिलाधिकारी ने चश्मा उतार दिया।

“तुम्हें बहुत सवाल सूझते हैं।”

चतुरानंद बाबू समझ गए कि सरकारी नौकरी में सवाल पूछने की सीमा वही है जहाँ अधिकारी की भौंह उठ जाए।

अगले दिन प्रखंड कार्यालय में आदेश पहुँचा—विद्यालयों, छात्रावासों और सरकारी परिसरों में दीये जलाए जाएँ।

एक शिक्षक ने पूछा, “बच्चों को भी बुलाना है?”

“हाँ।”

“लेकिन बाढ़ से कई बच्चे विस्थापित हैं।”

“उन्हें भी बुलाओ।”

“उनके पास कपड़े नहीं हैं।”

“दीया जलाना है, फैशन शो नहीं।”

“कुछ बच्चों ने दो दिन से खाना नहीं खाया है।”

अधिकारी ने कहा, “आज राष्ट्रीय कार्यक्रम है। भूख की बात मत करो।”

शिक्षक ने सोचा—भूख भी शायद सरकारी आदेश से छुट्टी पर चली जाती होगी।

शाम को विद्यालय में बच्चों की कतार लग गई।

प्रधानाध्यापक ने कहा, “आज हम सब मिलकर रोशनी करेंगे।”

पीछे खड़ा एक बच्चा बोला, “सर, हमारे घर में कल से चूल्हा नहीं जला।”

प्रधानाध्यापक ने कहा, “आज शुभ अवसर है। ऐसी बातें नहीं करते।”

बच्चे ने पूछा, “सर, शुभ अवसर पर भूख नहीं लगती?”

प्रधानाध्यापक ने उसकी ओर देखा।

उनके पास पाठ्यक्रम में इसका उत्तर नहीं था और शासनादेश में भी नहीं।

उन्होंने कहा, “दीया जलाओ।”

बच्चे ने दीया जला दिया।

उसके हाथ में मिट्टी का दीपक था। घर में मिट्टी का चूल्हा ठंडा था।

सरकारी रजिस्टर में उसका नाम दर्ज हुआ—“राष्ट्रीय उत्सव में सहभागी।”

किसी रजिस्टर में यह नहीं लिखा गया कि वह बच्चा राष्ट्रीय उत्सव से पहले भूखा था और उत्सव के बाद भी भूखा रहेगा।

यह हमारी व्यवस्था की खूबी है। वह आदमी की भूख को भी आँकड़ा बना सकती है, बशर्ते उसे किसी योजना की प्रस्तुति में इस्तेमाल करना हो।

उधर विधायक फूलचंद प्रसाद के सरकारी आवास पर भी तैयारी चल रही थी।

फूलचंद जी ने नौकर से पूछा, “दीये कितने हैं?”

“बीस।”

“तेल?”

“कम है।”

“तो दस जलाओ।”

“बाकी दस?”

“अगले साल काम आएँगे।”

नौकर ने पूछा, “तेल भी बचा लें?”

विधायक ने कहा, “तेल बचाने की बात मत करो। कहीं लोग समझ जाएँ कि महँगा है।”

उसी जिले में दूसरे विधायक लल्लन बाबू का सरकारी आवास अँधेरे में था।

पत्रकार ने पूछा, “यहाँ दीया क्यों नहीं?”

माली ने कहा, “साहब ने मना किया है।”

“क्यों?”

“कहते हैं, सरकारी आवास में सरकार की बिजली जलती है। अब जन्मदिन का तेल भी सरकार देगी क्या?”

पत्रकार ने माली की ओर देखा।

माली बोला, “साहब, हमारे गाँव में बच्चे अँधेरे में पढ़ते हैं।”

पत्रकार ने नोटबुक निकाली।

माली घबरा गया।

“यह मत लिखिएगा।”

“क्यों?”

“नौकरी चली जाएगी।”

पत्रकार ने नोटबुक बंद कर दी।

देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता थी। बस अभिव्यक्ति के साथ नौकरी न चली जाए, इसका ध्यान रखना पड़ता था।

राजधानी में इस बीच टीवी चैनलों पर रोशनी बढ़ती जा रही थी।

एक चैनल कह रहा था—“यह जनभागीदारी का अभूतपूर्व उदाहरण है।”

दूसरा बता रहा था—“देशभर में करोड़ों दीपों का लक्ष्य।”

तीसरे चैनल पर बहस थी—“क्या दीपक का आकार बड़ा होना चाहिए?”

चौथे पर विशेषज्ञ बता रहे थे कि इतने बड़े आयोजन से राष्ट्र की भावनात्मक ऊर्जा बढ़ती है।

किसी चैनल ने यह नहीं पूछा कि जिस हाथ ने दीया जलाया, उस हाथ में अगले दिन राशन की थैली होगी या नहीं।

टीवी की रोशनी में भूख दिखाई नहीं देती।

भूख दिखाई देने लगे तो कार्यक्रम की चमक खराब हो जाती है।

दीपपुर के बूढ़े हरखू बाबा यह सब देख रहे थे।

उन्होंने पोते से पूछा, “इतने दीये क्यों जल रहे हैं?”

“प्रधानजी का जन्मदिन है।”

“उनके घर में अँधेरा है?”

“नहीं।”

“फिर?”

पोता चुप।

बाबा बोले, “हमारे गाँव में बाढ़ है?”

“हाँ।”

“चूल्हा जला?”

“नहीं।”

“दीया जला?”

“हाँ।”

बाबा कुछ देर सोचते रहे।

फिर बोले, “अच्छा! अब समझ में आया। सरकार ने रोशनी और रोटी का विभाग अलग-अलग कर दिया है।”

पोता हँस पड़ा।

बाबा नहीं हँसे।

“हमारे समय में,” उन्होंने कहा, “आदमी पहले घर रोशन करता था, फिर चौपाल।”

मास्टरजी पास बैठे थे।

उन्होंने कहा, “बाबा, इसे सकारात्मक रूप में देखिए।”

बाबा ने पूछा, “सकारात्मक क्या?”

“दीया आशा का प्रतीक है।”

बाबा बोले, “तो आशा का थोड़ा आटा भी भेज दो।”

मास्टरजी चुप हो गए।

बाबा ने फिर कहा, “बाढ़ में फँसे आदमी को चावल मिल जाए, वह भी आशीर्वाद है। बीमार को दवा मिल जाए, वह भी आशीर्वाद है। बच्चे को किताब मिल जाए, वह भी आशीर्वाद है। विधवा को पेंशन समय पर मिल जाए, वह तो बहुत बड़ा आशीर्वाद है।”

फिर उन्होंने दीये को देखा।

“दीया बुरा नहीं है बेटा। अँधेरे में दीया बहुत जरूरी है। लेकिन आदमी को अँधेरे में छोड़कर उसके सामने दीया जलाना वैसा ही है जैसे डूबते आदमी को तैरना सिखाने के बजाय उसके सामने तैराकी का पोस्टर लगा देना।”

मास्टरजी ने पहली बार अखबार नीचे रख दिया।

अगले दिन जिला मुख्यालय में समीक्षा बैठक हुई।

अधिकारी ने पूछा, “कितने दीये जले?”

“साढ़े तीन लाख।”

“फोटो?”

“हैं।”

“वीडियो?”

“हैं।”

“समाचार प्रकाशित?”

“जी।”

“सोशल मीडिया?”

“वह भी।”

अधिकारी प्रसन्न हुए।

“बहुत अच्छा।”

फिर अचानक पूछा, “बाढ़ राहत?”

कमरे में सन्नाटा।

“सर, प्रक्रिया चल रही है।”

“कितने परिवारों तक पहुँची?”

“अभी संख्या उपलब्ध नहीं है।”

“लेकिन दीयों की संख्या?”

“साढ़े तीन लाख।”

अधिकारी मुस्कुराए।

यह वह मुस्कान थी जो तब आती है जब सरकार को कोई आँकड़ा मिल जाता है, चाहे वह आँकड़ा जनता के काम का हो या न हो।

चतुरानंद बाबू ने धीरे से पूछा, “सर, अगर जनता पूछे कि इतने दीयों पर कितना खर्च हुआ?”

“कहना—यह खर्च नहीं, भावना है।”

“और अगर पूछे कि भावना का भुगतान किसने किया?”

अधिकारी ने कहा, “जनता ने।”

चतुरानंद बाबू ने सिर हिलाया।

“जनता बहुत उपयोगी संस्था है। चुनाव में वोट देती है, कार्यक्रम में भीड़ देती है और खर्च में भावना।”

बैठक समाप्त हो गई।

शाम को चतुरानंद बाबू घर लौट रहे थे। सड़क किनारे एक बूढ़ी महिला बैठी थी। सामने बुझी लालटेन।

उन्होंने पूछा, “अम्मा, दीया क्यों नहीं जलाया?”

“तेल नहीं है।”

चतुरानंद बाबू की जेब में सरकारी कार्यक्रम का बचा हुआ एक छोटा दीया था।

उन्होंने वह निकालकर महिला को दे दिया।

बूढ़ी ने दीया लिया और पूछा—

“तेल?”

चतुरानंद बाबू चुप।

महिला ने कहा—

“बाबू, खाली दीया देने से उजाला नहीं होता।”

चतुरानंद बाबू के पास इस बार भी सरकारी उत्तर नहीं था।

दूर शहर में हजारों दीये जल रहे थे।

यहाँ एक दीया तेल माँग रहा था।

वहाँ कैमरे रोशनी गिन रहे थे।

यहाँ लोग अँधेरा।

वहाँ जन्मदिन था।

यहाँ बाढ़।

वहाँ भाषण था।

यहाँ भूख।

वहाँ जनभागीदारी थी।

यहाँ जनता प्रतीक्षा में।

अगले दिन अखबार में मोटे अक्षरों में छपा—

“दीपपुर लाखों दीयों से जगमगाया।”

नीचे एक छोटी-सी खबर थी—

“बाढ़ प्रभावित पाँच पंचायतों में राहत सामग्री की प्रतीक्षा।”

हरखू बाबा ने खबर पढ़ी।

उन्होंने पोते से कहा, “बेटा, अखबार वाले भी कमाल करते हैं।”

“क्यों?”

“उन्हें लाखों दीये दिखाई दिए, लेकिन पाँच पंचायतों का अँधेरा नहीं दिखाई दिया।”

पोते ने पूछा, “बाबा, अगले साल क्या होगा?”

बाबा ने कहा—

“शायद अगले साल दीये और ज्यादा जलेंगे।”

“और बाढ़?”

“वह भी आ सकती है।”

“तो फिर?”

बाबा ने कहा—

“फिर कोई भाषण देगा कि अँधेरे से लड़ना है।”

“और चूल्हा?”

“वह भी किसी दिन जल जाएगा।”

“कब?”

बाबा मुस्कुराए।

“जब सरकार को समझ आएगा कि चूल्हे की लौ कैमरे में कम दिखाई देती है, लेकिन आदमी का पेट उससे ज्यादा देर तक चलता है।”

उस रात दीपपुर में फिर रोशनी हुई।

सरकारी भवन जगमगाए।

मुख्य चौक चमका।

नेताओं के आवासों पर तस्वीरें खिंचीं।

लेकिन बाढ़ से घिरे एक घर में एक बच्चा अपनी माँ से पूछ रहा था—

“माँ, हमारे घर में दीया कब जलेगा?”

माँ ने बच्चे को सीने से लगा लिया।

वह कुछ नहीं बोली।

क्योंकि उसके पास तेल नहीं था।

और शायद उत्तर भी नहीं।

दूर किसी मंच से आवाज आ रही थी—

“देश रोशन हो रहा है।”

हरखू बाबा ने आसमान की ओर देखा और धीरे से कहा—

“रोशनी बहुत है बेटा।”

फिर कुछ देर रुककर बोले—

“बस यह देखना बाकी है कि वह किसके घर पहुँची।”

और यही दीपपुर का सबसे कठिन हिसाब था।

कितने दीये जले—यह गिनना आसान था।

कितने घरों में उजाला पहुँचा—यह गिनने की किसी को जल्दी नहीं थी।

कुमार धनंजय सुमन 

सोनवर्षा,थाना-बिहपुर,भागलपुर,बिहार 853201