अयोध्यापुरी की 4 एकड़ जमीन विवाद – रहवासी समिति का दावा खारिज

इंदौर

कंपनी पक्ष में फैसला, कलेक्टर-एसडीएम ने नहीं रखा पक्ष
इन्दौर जिला न्यायाधीश डॉ. शुभ्रा सिंह की कोर्ट ने अयोध्यापुरी की 4 एकड़ जमीन विवाद मामले को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई उपरांत देवी अहिल्या श्रमिक कामगार सहकारी संस्था मर्यादित के अध्यक्ष रणवीरसिंह सूदन द्वारा वर्ष 2007 में कराई गई रजिस्ट्री को सही ठहराते हुए अयोध्यापुरी रहवासी कल्याण समिति का दावा खारिज कर दिया। समिति ने दायर याचिका में कंपनी के पक्ष में हुई रजिस्ट्री को अवैध और शून्य घोषित करने की मांग की थी। मामला छोटी खजरानी स्थित अयोध्यापुरी कॉलोनी की चार एकड़ (1.619 हेक्टेयर) जमीन पर मालिकाना हक का है। मामले में कलेक्टर और एसडीएम को भी पक्षकार बनाया गया था, लेकिन सुनवाई के दौरान उनकी ओर से न कोई दलील दी गई, न दस्तावेज पेश किए गए और न ही बयान दर्ज कराया गया। याचिका कहानी संक्षेप में इस प्रकार है कि एलआइजी चौराहे के पास देवी अहिल्या श्रमिक कामगार सहकारी संस्था की कुल 6.28 हेक्टेयर (15.52 एकड़) जमीन में से 1.619 हेक्टेयर (चार एकड़) जमीन सिम्पलेक्स कंपनी ने खरीदी थी। संस्था की साधारण सभा में 7 जनवरी 2007 को पारित प्रस्ताव के आधार पर 24 फरवरी 2007 को चार करोड़ रुपए में रजिस्ट्री कराई गई। 19 फरवरी 2008 को राजस्व रिकॉर्ड में भी कंपनी का नाम दर्ज हो गया। अयोध्यापुरी रहवासी कल्याण समिति का आरोप था कि संस्था वर्ष 2000-01 में ही इस जमीन पर कॉलोनी विकसित कर 250 से अधिक सदस्यों को भूखंड बेच चुकी थी। ऐसे में वर्ष 2007 में उसी जमीन की दोबारा विक्री का संस्था को कानूनी अधिकार नहीं था। सिम्पलेक्स कंपनी ने अपना मूल वाद 20 नवंबर 2012 को वापस ले लिया था। इसके बाद समिति के प्रतिदावे पर सुनवाई उपरांत कोर्ट ने आदेश में कहा कि समिति के सदस्यों को संस्था ने केवल भूखंड आवंटन पत्र जारी किए थे। संपत्ति अंतरण अधिनियम के तहत 100 रुपए से अधिक मूल्य की अचल संपत्ति का स्वामित्व रजिस्ट्री से हस्तांतरित होता है. केवल आवंटन पत्र से नहीं। वहीं सुनवाई दौरान समिति की ओर से कोर्ट को यह भी बताया गया कि कंपनी द्वारा चार करोड़ रुपए में से सिर्फ 1.80 करोड़ रुपए चुका शेष राशि के चेक रोक लिए गए हैं जिस पर कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए निर्णय दिया कि आशिक भुगतान के बावजूद रजिस्ट्री से खरीदार को स्वामित्व मिल सकता है। बकाया राशि की वसूली के लिए अलग कानूनी कार्रवाई की जा सकती है, लेकिन इस आधार पर रजिस्ट्री शून्य नहीं होती। हालांकि कोर्ट ने माना कि रिकॉर्ड के अनुसार जमीन मास्टर प्लान में पीएसपी (स्वास्थ्य) उपयोग के लिए आरक्षित थी। यहां रिहायशी निर्माण की अनुमति नहीं थी। अयोध्यापुरी कॉलोनी को नगर तथा ग्राम निवेश (टीएंडसीपी) से मंजूरी नहीं मिली थी और नगर निगम ने भी इसे वैध घोषित नहीं किया था। हालांकि, कोर्ट में सुनवाई के दौरान कलेक्टर और एसडीएम की ओर से कोई पक्ष नहीं रखा गया।
ज्ञात हो कि इस जमीन की संस्था के सदस्यों की शिकायत पर कलेक्टर ने वर्ष 2009 में एसडीएम से जांच भी कराई थी। इसके बाद जमीन का नामांतरण निरस्त करने और रजिस्ट्री शून्य करने की कार्रवाई शुरू की गई थी। इसी कार्रवाई के बाद कंपनी ने पहली बार नोटिस जारी किया था।