:: चातुर्मास धर्मसभा में बोले राष्ट्रसंत- सुख-सुविधाओं के मोह में जीवन का उद्देश्य न भूलें, आत्मकल्याण के लिए करें चिंतन ::
इंदौर । धर्म का उद्देश्य सिर्फ पूजा-पाठ करना या सुख-सुविधाएं पाना नहीं, बल्कि अपनी सोच बदलकर आत्मकल्याण की दिशा में बढ़ना है। पूजा, व्रत, नियम और स्वाध्याय के साथ यह भी विचार करना चाहिए कि हम वैराग्य और मोक्ष के मार्ग पर कितना आगे बढ़ रहे हैं। यह बात राष्ट्रसंत मुनि पुंगव सुधासागर महाराज ने बुधवार को छत्रपति नगर स्थित दलाल बाग में चल रही चातुर्मास धर्मसभा में कही।
मुनिश्री ने कहा कि मनुष्य जीवन पाने के लिए अनेक पुण्य और प्रयास लगते हैं। इसके बाद परिवार, धन-संपत्ति और सुख-सुविधाएं मिलती हैं। लेकिन इनके मोह में उलझकर जीवन के वास्तविक उद्देश्य को नहीं भूलना चाहिए। संसार में रहते हुए आसक्ति कम करना और आत्मा की उन्नति के लिए प्रयास करना जरूरी है।
:: सीट और स्टेशन का उदाहरण देकर समझाया मोह ::
मुनिश्री ने कहा कि जब हमें कहीं जाना होता है, तो ट्रेन में सीट पाने के लिए काफी प्रयास करते हैं। लेकिन स्टेशन आने पर उसी सीट को छोड़कर उतरने की तैयारी करने लगते हैं। इसी तरह मनुष्य जीवन में सुख-सुविधाएं जुटाने के लिए प्रयास करता है, लेकिन उसे इनके प्रति आसक्त नहीं होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि हर व्यक्ति को खुद से सवाल करना चाहिए कि क्या मंदिर जाने, पूजा करने, जाप और स्वाध्याय से उसके भीतर वैराग्य की भावना बढ़ रही है? क्या वह केवल वर्तमान जीवन को बेहतर बनाने में लगा है या संसार के बंधनों से मुक्ति का मार्ग भी खोज रहा है? धर्म का वास्तविक उद्देश्य समझने के लिए ऐसे सवालों पर आत्मचिंतन जरूरी है।
सकल दिगम्बर जैन धर्म प्रभावना समिति के तत्वावधान में आयोजित धर्मसभा का शुभारंभ मंगलाचरण और पाद प्रक्षालन के साथ हुआ। दलाल बाग परिसर में निर्मित विद्या-सुधा मंडप में चातुर्मास के दौरान प्रतिदिन सुबह 8 से 9.30 बजे तक प्रवचन हो रहे हैं।

