जयपुर के पास एक गांव में एक जमींदार जयसिंह रहता था। उसका गांव में सब लोग बहुत सम्मान करते थे। वह गांव का सबसे धनी व्यक्ति था। उसके पास किसी भी चीज की कोई कमी नहीं थी। वह हर सुख- दुख में गांव वालों की मदद करता था। पर उसमें अहंकार बहुत था।
उसके तीन बच्चे थे। एक लड़का था जिसका नाम रोहित था। राधा और मीरा नाम की दो सुंदर लड़कियां थी।
जब रोहित पांच वर्ष को हो गया तो उसे अध्ययन के लिए गांव के स्कूल में ही पढ़ने भेजा गया। उसका मन पढ़ने में नहीं लगता था। जमींदार का बेटा होने के कारण पहले साल तो अध्यापकों ने इस तरफ कुछ ध्यान नहीं दिया। अगले वर्ष स्कूल खुले। वह दूसरी कक्षा में पढ़ने आ गया । आदत के अनुसार उसका पढ़ने में बिल्कुल मन नहीं लगता। वह खूब शरारत करता व अन्य बच्चों को तंग भी करता। दिन पर दिन उसकी शरारतें बढ़ती जा रही थीं।
एक बार रोहित ने स्कूल के चपरासी बूढ़े रामु काका का चश्मा ही तोड़ दिया। रामु काका ने उसे समझाने की बहुत कोशिश की तो उन्हें ही भला बुरा कहने लगा। इस शरारत का जब अध्यापक को पता चला तो उन्होंने रोहित को कक्षा से बाहर खड़ा कर दिया और समझाया कि अब यदि वह पढ़ाई में ठीक से ध्यान नहीं लगाएगा तो उसे विद्यालय से बाहर निकाल दिया जाएगा।
परन्तु रोहित पर इस बात का भी कोई असर नहीं पड़ा। उसकी शरारतें दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही थी। कभी किसी बच्चे को पिट देता तो कभी किसी की स्लेट तोड़ देता। बच्चे भी उससे तंग आ चुके थे पर जमींदार का पुत्र होने के कारण डर के मारे शिकायत नहीं कर पाते थे।
एक दिन उसने अध्यापक जी के साथ ही शरारत कर दी। रास्ते मे से वह ‘केमच फली’ ले आया था और अध्यापक जी की कुर्सी पर रगड़ दी। जिसके तंतु उनके हाथ पर लगते ही भयानक रूप से खुजली होने लगी। उन्हें पता चल गया था कि यह शरारत रोहित ने ही कि है। गुस्से में उन्होंने रोहित को खूब डांटा और घर भेज दिया।
यह बात जब जमींदार को पता चला तो उसको बहुत गुस्सा आया। उसने अध्यापक को घर बुलाया और खूब बुरा- भला कहा। आखिर जमींदार होने का घमंड उस पर हावी हो गया। उसने रोहित को स्कूल नहीं भेजने का फैसला कर लिया। अध्यापक ने जमींदार को उसकी शरारतों के बारे में बताना चाहा पर वह कुछ सुनने को तैयार नहीं था।
समय बीतता रहा। रोहित, राधा व मीरा बड़े होते गए अचानक जमींदार बीमार पड़ गया। अब उससे मेहनत का कोई काम नहीं हो पाता था।
गांव में एक दिन डाकुओं ने धावा बोल दिया। गांव वालों के साथ ही जमींदार की सारी संपत्ति भी डाकू लूट कर भाग गए। इस घटना से जयसिंह के दिल पर बुरा असर पड़ा और वह इस संसार से चल बसा।
अब परिवार की जिम्मेदारी रोहित पर आ पड़ी थी। उस पर तो जैसे मुश्किलों का पहाड़ ही टूट पड़ा था। अपना व बहनों का खर्च भी नहीं चल पा रहा था। उसने विचार किया कि शहर चला जाऊं और कोई नोकरी करके घर का खर्च चलाने जितना पैसा तो कमाऊं।
रोहित अपनी बहनों को लेकर जयपुर आ गया। वहां एक छोटा सा कमरा किराए ले लिया। अब वह रोज काम की तलाश में जाने लगा। अनपढ़ होने के कारण उसे कोई अच्छा काम नहीं मिल पा रहा था। हारकर उसने एक होटल में बर्तन साफ करने की नोकरी करना शुरू कर दिया। वहां से प्रतिदिन जो पैसा मिलता उससे राशन का सामान खरीद लाता और परिवार का पालन पोषण करता।
अनपढ़ होने के कारण हर जगह रोहित को अपमानित भी होना पड़ता था। अब उसे अपनी गलती का अहसास होने लगा था।वह सोचता, ‘काश! मैं भी पढ़ लिख गया होता तो आज कहीं अच्छी नोकरी कर अपने परिवार का शान से पालन – पोषण करता। उसे बहुत पश्चाताप होने लगा। पर उसका उत्साह कम नहीं हुआ। वह बर्तन साफ करने के साथ साथ होटल में वेटर का काम भी करने लगा । इससे उसे ग्राहकों से कुछ राशि टिप में मिल जाती थी।
एक दिन रोहित होटल में ग्राहकों को नाश्ता परोस रहा था। तभी उसकी नज़र एक व्यक्ति पर पड़ी जिसका चेहरा जाना -पहचाना लग रहा था। अचानक उसे याद आ गया कि ये तो वही अध्यापक हैं, जिन्होंने बचपन मे उसकी शरारतों से तंग आकर उसे डांटा था और स्कूल से निकाल दिया था।
रोहित उनके पास पहुँच कर और बोला, “नमस्कार गुरुजी! “
“कौन हो भाई? मैंने आपको पहचाना नहीं ” अध्यापक जी उसे पहचानने को कोशिश करते हुए बोले।
“गुरुजी, मैं बचपन मे आपके स्कूल में पढ़ता था। जमींदार जयसिंह का बेटा। पढ़ने में मेरा मन नहीं लगता था।बहुत शरारतें किया करता था। इस कारण स्कूल भी छूट गया। डाका पड़ने से घर का सब कुछ लूट गया। पिताजी सदमें को बर्दाश्त न कर पाए और चल बसे।” कहते हुए रोहित ने यहां शहर आकर नोकरी करने तक की सारी बातें बता दी।
अध्यापक जी को याद आ गया। वह रोहित को पहचान गए। रोहित की यह हालत देखकर उन्हें बहुत दुःख हुआ।
“बेटा, यदि तुमने बचपन के पढ़ना न छोड़ा होता तो आज कहीं अच्छी जगह नोकरी कर रहे होते और खुशहाल जीवन जी रहे होते।” गुरुजी ने कहना जारी रखा, ” शिक्षा तो जीवन मे उजास भरती है । आगे बढ़ने का हौसला देती है व समाज मे
में इज्जत दिलवाती है।”
“गुरुजी! क्या अब भी मैं पढ़ सकता हूँ ?” भावुक होते हुए रोहित बोला, ” मैंने जीवन की सच्चाई को समझ लिया है। सच में, बिना शिक्षा के जीवन पशु के समान होता है। आगे बढ़ने का कोई रास्ता नहीं मिल पाता है। इस बात को मैं खूब अनुभव कर रहा हूँ।”
अध्यापक जी ने उसे समझाया कि,” पढ़ने की कोई उम्र नहीं होती है। मैं भी अब इसी शहर में आ गया हूँ। सचमुच तुम पढ़ना चाहते हो तो अवश्य पढ़ो। मुझसे जो चाहो सहयोग लो।मुझे बहुत खुशी होगी।” कहते हुए उन्होंने एक कागज पर अपने घर का पता व फोन नम्बर रोहित को दे दिया।
रोहित की आंखों में चमक आ गई। इसने गुरुजी का आभार व्यक्त किया और उन्हें विदा कर दिया।
रोहित ने दृढ़ निश्चय कर लिया कि कुछ भी हो जाये, अब वह पढ़ाई करेगा। होटल के काम से छुट्टी पाते ही वह गुरुजी के घर जा पहुंचा और पढ़ने का निश्चय उन्हें बताया। गुरुजी ने सरकार की स्वयमपाठी विद्यार्थियों के लिए “खुला विद्यालय परीक्षा योजना” बाबत उसे समझाया जिसमें सीधे – सीधे ही बाहरवीं की परीक्षा देने का प्रावधान था।
रोहित को पुस्तकें देते हुए गुरुजी ने कहा, “बेटा, जुनून के आगे जीत पक्की है। तुम हमेशा दो घण्टे पढ़ने मेरे यहाँ आ जाया करना। तुम्हें पढ़ाकर मुझे भी खुशी होगी।”
अब रोहित दिन भर होटल में काम करता और वहां से आकर गुरुजी के यहां पढ़ने चला जाता। बस ,अब उस पर एक ही धुन सवार थी पढ़ना और पढ़ना। गुरुजी उसकी यह लगन देख कर खूब खुश थे।जब भी उसे वक्त मिलता पढ़ता ही रहता। समय पर उन्होंने रोहित का परीक्षा फार्म भी भरवा दिया। परीक्षा के समय भी वे रोहित को बराबर समझाते की कैसे परीक्षा में उत्तर लिखने होते हैं।
परीक्षा का परिणाम आता उससे पहले ही उसने अगली कक्षा की पढ़ाई भी प्रारम्भ कर दी।
जब परीक्षा परिणाम आया तो वह बहुत खुश हुआ और गुरुजी के यहां पहुंचकर उनके चरण छूकर आशीर्वाद लिया। वह प्रथम श्रेणी में पास हुआ था।
गुरुजी का मार्गदर्शन उसे बराबर मिलता रहा। उसने बी. काम. की पढ़ाई भी प्रथम श्रेणी में पास करली। वह कम्प्यूटर पर काम करना भी सीख गया।होटल मालिक ने भी उसकी योग्यता और लगन देखते हुए उसको वहीं मैनेजर बना दिया। तनख्वाह भी बहुत अच्छी मिलने लगी।
धीरे धीरे उसने होटल मैनजमेंट की डिग्री भी प्राप्त कर ली। उसकी देखरेख में होटल बहुत प्रसिद्ध हो गया तो मालिक ने दो शहरों में नए होटल खोल दिये और राहुल को भागीदार बना दिया। उसकी भी शादी एक अच्छे परिवार में हो गई। दोनों बहनों की भी शादी धूमधाम से अच्छे परिवारों में करवा दी गई।
गुरुजी का उस पर पूरा आशीर्वाद था। उसी शहर में गुरुजी के निर्देशन में एक विद्यालय भी खोल लिया। जिसमे गरीब परिवार के बच्चों की निःशुल्क पढ़ाया जाने लगा। शिक्षा से ही जीवन निर्माण होता है का सन्देश प्रचारित करने लगा। रोहित को समझ आ गया था कि शिक्षा ने ही उसके परिवार की खोई हुई खुशियां व समृद्धि लौटाई है।आज शहर ही क्या शहर के बाहर भी उसकी होटलों व विद्यालयों की चर्चा होती। उसका नाम सम्मान के साथ लिया जाताहै। रोहित शिक्षा का उजाला जन जन तक फैलाने के काम में समर्पण भाव से लग गया।●
■ राजकुमार जैन राजन
प्रधान संपादक : सृजन महोत्सव
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