कोरोना की आड़ में

          आज समूची कायनात कोरोना के कहर से भयग्रस्त है क्योंकि एक महामारी के रूप में मानव जाति का विनाश करने पर आमादा है। पिछले साल हम कोरोना के कोप को झेल चुके हैं और हमें कई खट्टे मीठे अनुभवों से गुजरना पड़ा है।

         महामारियां फैलना कोई नई बात नहीं है। पहले भी अनेक महामारियां मौत का तांडव कर चुकी है। ऐसे संकटकालीन समय में आपसी सहयोग और धैर्य की जरूरत है। ऐसी भयावह स्थिति में भी कई मुनाफाखोर अपनी जेबें भरने में लगे हुए हैं। ‘मास्क’ की बात करें तो तथाकथित मानव रक्षक मनचाहे दाम में बेचकर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं। अरे भाई,ये लोग मानवता से प्यार कर रहे हैं या मानवता का व्यापार कर रहे हैं? 

     इतना होते हुए भी हम बहुत भाग्यशाली हैं कि हमारे देश का भूगोल और भौगोलिक स्थिति हमेशा से हमारा साथ देती आ रही है। प्रकृति ने भी सदैव हमारी रक्षा की है लेकिन हमने ही प्रकृति के साथ खिलवाड़ किया है। पेड़ काटे हैं, जहरीली गैसों को फैलाया है, पर्यावरण को दूषित किया है। जो हमारे रक्षक हैं, हम उन्हीं में के भक्षक हैं! अरे जनाब, बबूल का पौधा बोया है तो आम नहीं कांटे ही मिलेंगे।

     हम प्रकृति के साथ खिलवाड़ करते आए हैं और प्रकृति बराबर हमारा साथ दे रही है। जाहिर है हमारे यहां की भौगोलिक परिस्थितियां और प्रकृति ‘अहर्निश सेवामहे’ की तरह हमारा साथ देती आ रही हैं और हम जो कुदरत के साथ कर रहे हैं, वह जगजाहिर है!

               शिक्षित वर्ग की अपेक्षा अशिक्षित लोगों को जागरूक करना और उन्हें संबल प्रदान करना हमारा मानवीय कर्तव्य है। लेकिन सिरफिरे लोगों को समझाना टेढ़ी खीर है।

कोरोना से सुरक्षा के लिए जब कोई अपने नाक और मुंह पर मास्क लगाता है तो वह अपने आप को मानसिक रूप से सुरक्षित समझता है लेकिन मुनाफाखोरों को इससे क्या लेना देना! एक के दस करके ही उन्हें सुकून मिलता है! उनके संविधान में मानवीयता नाम का कोई नीति निर्देशक तत्व कदाचित है ही नहीं!

         सेनेटाइजर के दामों में भी वृद्धि हो रही है। पर्याप्त मात्रा में होने पर भी कालाबाजारी! संवेदनशीलता के स्थान पर ऐसी संवेदनहीनता? किसी ने बहुत खूब कहा है,” अपनों ने लूटा, गैरों में कहां दम था। अपनी कश्ती भी वहीं डूबी, जहां पानी कम था।” तो जनाब,बाड़ ही जब खेत को खाने लगेगी, तब खेत का क्या होगा? इस अवसर पर हमें समझने-समझाने की जरूरत है ना कि अपना हित साधने की। मोटे तौर पर यही समझना है कि ऐसी परिस्थितियों में कोरोना के नये अवतार ओमिक्रोन के खतरे को आंतरिक आपातकाल मानकर बचना और बचाना है। इतना ही नहीं लोगों को जागरूकता का संदेश देना है,यह समझते हुए कि मिलावटखोरों और मुनाफाखोरों का आज तक कोई बाल भी बांका कर पाया है क्या?

      क्या हम फिर से लाकडाउन को आमंत्रित नहीं कर रहे? कोरोना की आड़ में मानवता छोड़ कर हम किसी भी सूरत में न तो खुद का भला कर सकते हैं और न देश का!

जान है तो जहान है,बाकी सब वीरान है।

तरुण कुमार दाधीच

36,सर्वऋतु विलास, मेन रोड,

उदयपुर(राज) 313001

मोबाइल: 9414177572