मैसेंजर पर एक हेलो का मैसेज फ्लैश हुआ ..
“हेलो!”
रितिका ने ध्यान नहीं दिया। दो चार दिन लगातार मैसेज आया तो रितिका ने रिप्लाई कर दिया ।
“शायद आप पहचान नहीं रही। ” जवाब आया ।
“जी नहीं..” रितिका ने लिखा।
“पर मैने आपको देखा है .. बहुत अच्छे से।आपके हसबैंड को भी जानता हूँ।”
रितिका हैरान हुई .. वो तो बिल्कुल पहचान नहीं रही थी…..फेसबुक पर फोटो देखने के बाद भी ।
एक दिन जब वह किसी काम से बाहर जा रही थी उसने देखा कि सामने वाले शाप पर एक जाना पहचाना चेहरा उसे देख रहा था। “वो तेरी ..ये तो वही फेसबुक वाला बंदा ही है ..समर” रितिका ने सोचा ..और एकदम से मुस्कुरा उठी।
वह लड़का ‘समर ‘ भी उसे पहचानते और मुस्कुराते देख खिल सा गया।
उसके बाद कभी कभी रितिका और समर की बात होने लगी थी। समर एक प्राइवेट कम्पनी में काम करता था, घर में माँ और दो छोटी बहनें थी। पिता नहीं थे तो अपनी जिम्मेदारी समझते हुए समर ने एक छोटी बहन का रिश्ता तय कर दिया था। रितिका भी ये समझ चुकी थी कि समर एक अच्छा लड़का है.. तो कभी मैसेंजर में बात हो जाती थी। रितिका को एक ही बात खटकती थी कि जब तब बात के बीच में समर कह उठता ..”अपनी एक फोटो दीजिए ना..”
रितिका को अच्छा नहीं लगता क्योंकि रितिका अपनी मर्यादा समझती थी। कुछ दिन बाद रितिका ने समर को नजरअंदाज करना शुरू कर दिया। समर भी थोड़ी कोशिशों के बाद समझ गया शायद कि यही ठीक है।
हालांकि समर का रितिका के कॉलोनी में आना जाना था तो यदा कदा सामना हो जाता था तो दोनों मुस्कुरा उठते थे पर इससे ज्यादा कुछ नहीं था। एक दिन रितिका घर के पास वाले मेडिकल शॉप से दवा ले रही थी कि एक आदमी बदहवास सा आया और जल्दी से अपना दवा निकालने की बात करने लगा। रितिका को लगा कि कोई इमरजेंसी है तो पहले शापकीपर से उन्हें ही दवा देने की बात की। “थैंक यू मैडम ” वह आदमी बोला। बातों बातों में यह पता चला कि ये समर के लिए मेडिसिन ले रहा था … समर हास्पिटल में था ..उसका ब्रेन हैम्रेज हो गया था ।
“हे ईश्वर!” रितिका शॉक रह गई। रितिका उसदिन जान पाई कि समर शादीशुदा था और तीन महीने की बच्ची थी उसकी एक। समर ने कभी जिक्र नहीं किया था और रितिका ने कभी पुछा भी नहीं था। और रितिका को कोई फर्क भी नहीं था बस समर अपनी पत्नी बच्चे के लिए ठीक हो जाये , इतना ही उसने सोचा । कई दिन बीत गए .. रितिका भी अपने सामान्य दिनचर्या में व्यस्त हो गई पर कभी कभी सोचती कि समर ठीक होगा।
एक शाम रितिका घर से बाहर निकली ही थी कि वह दवा लेने वाला आदमी दिख गया। “भाई साब , क्या हुआ? अभी कैसे हैं आपके दोस्त।” रितिका ने लगभग चिल्लाते हुए पुछा।
पहले तो वे हिचकिचाये ..फिर शायद पहचान कर रितिका के पास आ गए। ” समर नहीं रहा मैडम..” “ओह.. ” रितिका के मुँह से बस इतना निकाला। “समर के परिवार का बुरा हाल है मैडम.. वही उनकी उम्मीद था..पत्नी का तो रो रोकर बुरा हाल.है..” रितिका अब कुछ भी नहीं सुन रही थी। ऐसा कोई घनिष्ठ रिश्ता भी नही था समर से ..पर रितिका को दुख हो रहा था… बहुत दुख हो रहा था।—-साधना सिंह