टॉप परफॉर्मर

     हर साल की तरह इस बार भी इंस्टीट्यूट के टॉप परफॉर्मर का चुनाव हो चुका था। स्टाफ में खुसर फुसर चल रही थी।  ” सुखबीर सिंह इस बार ट्रॉफी नहीं ले जा पाएंगे। ” संदीप ने कॉफी का कप हाथ में उठाते हुए अपनी राय दी। ” हां उस बुड्ढे से जान छूटी।” कहकर मोहित खिलखिलाकर हंस पड़ा।” सभी उसकी बात से सहमत थे। सुखबीर सिंह पर छींटाकशी का दौर चल पड़ा। सभी अपने अपने अनुभव बता रहे थे। अपना फ्रस्ट्रेशन निकाल रहे थे। 

तीन साल पहले एक रिटायर्ड कर्मचारी ने वापिस संस्थान में प्रवेश लिया था। पैंसठ साल की उम्र लेकिन चुस्ती फुर्ती देखते ही बनती थी।काम करने का बेहतरीन तरीका। सभी युवा कर्मचारी परेशान। 

“क्या जरूरत पड़ गई इसे वापिस आने की ? एक और बेरोजगार को नौकरी मिल सकती थी। इंस्टीट्यूट भी बूढ़ा हो गया है।” दिल ही दिल में सब सुखबीर सिंह को कोसते रहते।

एक अलग ही माहौल बना रहता था उन दिनों। कोई भी ऐसा नहीं था जो उनसे बिना बात परेशान न रहता हो। उनके काम में कमी निकलने की कोशिश न करता हो। लेकिन वो हमेशा शांत रहते। मुस्कुराते ही रहते। उनकी मुस्कुराहट स्टाफ को और भी मजबूर कर देती कुढ़ने पर। 

नए साल की शुरुवात में एक ही ख़बर सबकी पसंदीदा बनी हुई थी। ,” सुखबीर सिंह संस्थान को छोड़कर अपने गांव में जा रहा है। गांव में एक फैक्ट्री लगा रहा है। लोगों को रोजगार देगा।” सबने अपनी अपनी तरह से बात को तोड़ा, मरोड़ा और बिखेरा। हां, किसी को भी सुखबीर सिंह से कोई सहानुभूति नहीं थी। सब उनका जाना ही चाहते थे। एक पेंशन प्राप्त करने वाला व्यक्ति उनके बराबर तनख्वाह ले रहा था यही बात उनकी समझ से हमेशा परे थी। उस पर हर साल टॉप परफॉर्मर की ट्रॉफी उन्ही को दी जा रही थी। 

“संस्थान चलाने वाले आंखें खोल ही नहीं रहे हैं तभी तो एक रिटायर्ड कर्मचारी को ट्रॉफी देकर दूसरे सभी कर्मचारियों का मनोबल गिरा रहे हैं।” आगे पीछे, इधर उधर, सब यही कहते सुनते थे। 

संस्थान का स्थापना दिवस आ गया था। सुखबीर सिंह की अनुपस्थिति में सब जी जान से तैयारियों में लगे हुए थे। संस्थान प्रमुख भी चुपचाप पूरे आयोजन पर नज़र जमाए हुए थे।

नियत तिथि पर पुरस्कार वितरण समारोह प्रारंभ हुआ। टॉप परफॉर्मर फिर से सुखबीर सिंह। सबके चेहरे उतर गए। पूरा स्टाफ उठकर चलने ही वाला था तभी संस्थान प्रमुख की आवाज़ सुनाई दी। “सुखबीर सिंह जैसे कर्मचारियों पर हम सभी को गर्व है जिन्होंने बिना कोई वेतन लिए तीन वर्ष तक इस संस्थान को अपनी सेवाएं दी हैं। इतना ही नहीं अपनी पेंशन भी उन्होंने संस्थान को देने का प्रस्ताव रखा है। और सबसे बढ़कर इस संस्थान की एक इकाई वो अपने गृहनगर में खोलने जा रहे हैं।” संस्थान प्रमुख अपनी बात पूरी कर पाते उससे पहले ही तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा ऑडिटोरियम गूंज उठा। सभी सुखबीर सिंह को ढूंढ रहे थे लेकिन वो अस्वस्थ होने के कारण से समारोह में नहीं आ पाए थे। 

अर्चना त्यागी 

व्याख्याता रसायन विज्ञान

एवम् कैरियर परामर्शदाता

जोधपुर ( राज.)