*इंतजार:*

आज इंतजार है हमें अपनों का,

उन खूबसूरत लम्हों का – 

जो फिर से मिला दें,

हमें अपने बिछड़ों से,

उनसे– जो कह कर गए थे –

“मिलेंगे हम जल्दी ही”, 

मगर उनकी ये बेरुखी,

अब सहने की सीमा से परे है।

आज तक खामोश हैं –

वो हवाएँ, वो फिजाएं,

अपलक रास्ता देखें,

मेरी ये सूनी निगाहें,

अब तो ये सूनी वादियॉं,

जल्दी से हों गुलजार,

कुछ और की चाह नहीं,

बस यही है तमन्ना मेरी।।।

……..

*श्याम श्रीवास्तव,

ई–ए सेक्टर, स्कीम क्रं. ९४,

इंदौर – ४५२०१०