कैलाश मानसरोवर का पारंपरिक पैदल मार्ग इतिहास के पन्नों में सिमटने को आतुर, सैकड़ों धर्मशालाएं बनीं खंडहर

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नई दिल्ली । सदियों से आस्था, तपस्या और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक रहा कैलाश मानसरोवर का पारंपरिक पैदल मार्ग धीरे-धीरे इतिहास के पन्नों में सिमटता जा रहा है। लगभग 400 किलोमीटर लंबे इस मार्ग पर कभी श्रद्धालुओं के कदमों की आहट और ‘हर-हर महादेव’ के जयकारे गूंजते थे, लेकिन अब यह रास्ता कहीं सड़क निर्माण में कट चुका है तो कहीं जंगलों और पहाड़ों में गुम हो गया है। यात्रियों और व्यापारियों के ठहरने के लिए बनी करीब 500 धर्मशालाएं भी देख-रेख के अभाव में खंडहर में तब्दील होती जा रही हैं।
कैलाश मानसरोवर यात्रा हिंदू धर्म की सबसे पवित्र यात्राओं में गिनी जाती हैं। सड़कें न होने के दौर में देशभर से श्रद्धालु इस कठिन यात्रा को पैदल तय करते थे। महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु सहित कई राज्यों के यात्री हल्द्वानी के काठगोदाम से अल्मोड़ा, बागेश्वर या टनकपुर-चंपावत होते हुए पिथौरागढ़ पहुंचते थे। वहां से अस्कोट, धारचूला और गुंजी के रास्ते लिपुलेख दर्रे को पार कर तिब्बत (चीन) में प्रवेश किया जाता था। यह मार्ग न सिर्फ धार्मिक, बल्कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार, जैसे-जैसे सड़क नेटवर्क का विस्तार हुआ, वैसे-वैसे पैदल मार्ग सिमटते चले गए। 1960 में पिथौरागढ़ तक सड़क पहुंची और 1970 के दशक में टनकपुर-तवाघाट राष्ट्रीय राजमार्ग बनने के बाद यात्री धारचूला तक वाहन से जाने लगे। बाद में सड़क तवाघाट और नजंग तक बन गई। वर्ष 2020 में सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) द्वारा सड़क को सीधे लिपुलेख दर्रे तक जोड़ दिया गया, जिससे परंपरागत पैदल मार्गों का उपयोग लगभग समाप्त हो गया।
इतिहासकारों के अनुसार, 1962 के भारत-चीन युद्ध तक इस यात्रा पर कोई रोक नहीं थी और भारत-तिब्बत के बीच व्यापार भी निर्बाध चलता था। युद्ध के बाद यात्रा और व्यापार बंद हुए, जिन्हें 1981 और 1992 में फिर बहाल किया गया। सांस्कृतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस प्राचीन पैदल मार्ग और उससे जुड़ी धर्मशालाओं का संरक्षण नहीं किया गया, तो यह अमूल्य विरासत पूरी तरह समाप्त हो सकती है।