नई दिल्ली । टैरिफ को लेकर अमेरिकी अदालती घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के साहसिक कदम की सराहना की है। उन्होंने सोशल मीडिया पर इस फैसले को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि अदालत की वैचारिक बनावट के बावजूद 6-3 का यह निर्णय ट्रंप की पूरी टैरिफ रणनीति के लिए एक बड़ा झटका है। रमेश के अनुसार, यह फैसला राष्ट्रपति की शक्तियों पर अंकुश लगाने और लोकतांत्रिक संतुलन बनाए रखने की दिशा में एक बड़ा उदाहरण है। वहीं, कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने इस फैसले के बहाने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब अमेरिकी अदालत में यह मामला लंबित था, तो भारत सरकार ने इतनी जल्दबाजी क्यों दिखाई?
खेड़ा ने आरोप लगाया कि यदि भारत कुछ दिन और इंतजार करता, तो देश एकतरफा और कथित तौर पर भारत-विरोधी व्यापार सौदे में फंसने से बच सकता था। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी द्वारा फरवरी की शुरुआत में वॉशिंगटन को किए गए फोन कॉल और भारत की शुरुआती इंतजार करने की रणनीति में आए बदलाव पर सवाल उठाते हुए इसे कूटनीतिक चूक करार दिया। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी अदालत का यह फैसला वैश्विक व्यापारिक परिदृश्य को बदल सकता है। राष्ट्रपति ट्रंप जिस आपातकालीन कानून के सहारे वैश्विक व्यापार को अपने अनुसार ढालने की कोशिश कर रहे थे, उसे अब कानून सम्मत नहीं माना गया है। इससे उन देशों को बड़ी राहत मिली है जो अमेरिकी टैरिफ के कारण आर्थिक दबाव झेल रहे थे। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि अमेरिकी प्रशासन इस कानूनी बाधा के बाद अपनी नई आर्थिक रणनीति किस प्रकार तैयार करता है और भारत के साथ हुए हालिया समझौतों पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है।
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक और दूरगामी फैसले में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लागू किए गए व्यापक व्यापारिक शुल्कों (टैरिफ) के बड़े हिस्से को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया है। 6-3 के बहुमत से आए इस निर्णायक फैसले ने न केवल ट्रंप के आर्थिक एजेंडे के मुख्य स्तंभ को ध्वस्त कर दिया है, बल्कि भारत सहित अमेरिका के प्रमुख व्यापारिक साझेदारों के लिए भी नई स्थितियां पैदा कर दी हैं। इस अदालती आदेश के बाद भारत में भी राजनीतिक प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हो गया है, जहाँ विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार की विदेश और व्यापार नीति पर गंभीर सवाल उठाए हैं। अमेरिकी शीर्ष अदालत के मुख्य न्यायाधीश जॉन रॉबर्ट्स ने बहुमत का पक्ष रखते हुए राष्ट्रपति की कार्यकारी शक्तियों की संवैधानिक सीमाओं को स्पष्ट किया। अदालत ने यह निर्धारित किया कि राष्ट्रपति के पास 1977 के इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट के तहत बिना संसदीय अनुमति के वैश्विक व्यापार को पूरी तरह से पुनर्गठित करने या असीमित मात्रा और अवधि के लिए आयात शुल्क थोपने का अधिकार नहीं है। फैसले में स्पष्ट किया गया कि इस तरह के व्यापक आर्थिक बदलावों के लिए स्पष्ट विधायी अनुमति अनिवार्य है और राष्ट्रपति एकतरफा तरीके से इन शक्तियों का प्रयोग नहीं कर सकते।

