बचपन से ही जस्मीत कौर को पौधों और जानवरों का दर्द महसूस हो जाता था—वो दर्द जो आम इंसान की आँखों से दिखाई नहीं देता। उनकी तकलीफ देखकर उनका दिल भर आता, और इसी वजह से उन्होंने इंटरस्पीशीज़ टेलिपैथिक कम्युनिकेटर बनने का रास्ता चुना।जस्मीत कहती हैं, “बहुत छोटी उम्र से ही मैं पौधों और जानवरों के प्रति भावुक और बहुत सहज रूप से जुड़ी हुई थी। मैं उनकी ऊर्जा और वाइब्रेशन महसूस कर सकती थी, जो शायद आम लोग महसूस नहीं कर पाते। मैं जानवरों और प्रकृति से बहुत जुड़ी हुई थी। उनका दर्द मैं सह नहीं पाती थी।”वो आगे कहती हैं, “अगर मुझे दर्द होता, तो मैं बोल सकती हूँ। लेकिन एक जानवर कैसे मदद माँगे? एक पेड़ सूख जाए या मर जाए, तो वो अपनी बात कैसे बताए? मुझे उनकी आवाज़ें महसूस होती थीं, जैसे वो मुझसे कुछ कहना चाहते हों। इसीलिए मैंने यह काम चुना।”एक इंटरस्पीशीज़ टेलिपैथिक कम्युनिकेटर के रूप में वो टेलिपैथी के ज़रिए जानवरों, पौधों और हर जीव से जुड़ती हैं।

