जनसंख्या वृद्धि की रफ्तार भी हुई मंदी
नई दिल्ली । भारत में जनसंख्या वृद्धि की रफ्तार लगातार धीमी होती जा रही है। बुजुर्गों की बढ़ती तदात को देखते हुए आशंका है कहीं जापान जैसे हालात भारत में भी न बन जाएं। सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (एसआरएस) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, देश का कुल प्रजनन दर (टीएफआर) घटकर 1.9 पर पहुंच गया है, जो रिप्लेसमेंट लेवल यानी 2.1 के मानक से भी नीचे है। इसका सीधा मतलब है कि अब देश में औसतन एक महिला अपने जीवनकाल में पहले के मुकाबले कम बच्चों को जन्म दे रही है। जब किसी देश का टीएफआर 2.1 होता है, तो आबादी संतुलित रूप से खुद को बदलती है, लेकिन इससे नीचे रहने पर भविष्य में जनसंख्या घटने की स्थिति पैदा हो सकती है।
क्षेत्रीय स्तर पर इस आंकड़े में काफी असमानता है। देश के छह राज्यों में प्रजनन दर अभी भी रिप्लेसमेंट लेवल से ऊपर है, जिसमें बिहार 2.9 के साथ शीर्ष पर है। इसके बाद उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और झारखंड का स्थान आता है। इसके विपरीत, दिल्ली में प्रजनन दर सबसे कम 1.2 दर्ज की गई है, जबकि केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में यह 1.3 है। पिछले एक दशक में दिल्ली और तमिलनाडु जैसे राज्यों में जन्मदर में 23 से 29 प्रतिशत तक की तेज गिरावट देखी गई है, जबकि बिहार में यह कमी केवल 9.4 प्रतिशत रही है।
जन्मदर में इस कमी के कारण राज्यों की जनसांख्यिकी बदल रही है। तमिलनाडु में 0-14 वर्ष के बच्चों की आबादी कुल जनसंख्या का केवल 18 प्रतिशत रह गई है, जबकि बिहार में यह 31.5 प्रतिशत है। पूरे भारत में यह आंकड़ा लगभग 24 प्रतिशत है। राहत की बात यह है कि देश की 66.4 प्रतिशत आबादी फिलहाल कामकाजी आयु वर्ग (15 से 59 वर्ष) में है, जो आर्थिक विकास के लिए एक बड़ा अवसर है।हालांकि, दक्षिण भारत के राज्यों में कामकाजी आबादी अब स्थिर हो रही है और बुजुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। केरल में बुजुर्गों की आबादी सबसे ज्यादा 15 प्रतिशत और तमिलनाडु में 14.2 प्रतिशत हो गई है। विशेषज्ञों के अनुसार, बेहतर शिक्षा, शहरीकरण, परिवार नियोजन और महंगाई के कारण लोग छोटे परिवारों को प्राथमिकता दे रहे हैं। आने वाले समय में सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती युवा आबादी को रोजगार देने और तेजी से बढ़ती बुजुर्ग आबादी के लिए सामाजिक व स्वास्थ्य सुरक्षा सुनिश्चित करने की होगी।

