इन्दौर लोकायुक्त पुलिस को साक्ष्यों के साथ की गई शिकायत के साक्ष्य लीक होने का हैरतअंगेज और सनसनीखेज मामला सामने आया है। जिसके बाद फरियादी ने लोकायुक्त पुलिस की ही शिकायत लोकायुक्त भोपाल, उप-लोकायुक्त और डीजी लोकायुक्त से की है। शिकायत सत्तर हजार रुपए के लेन-देन में एक मीडियाकर्मी की भूमिका की थी जिस पर लोकायुक्त कार्यालय इन्दौर की कार्रवाई पर सवाल उठाते शिकायत की गई है।
मामले में प्राप्त जानकारी अनुसार शहर के एक व्यापारी शेखर और उनके परिवार के खिलाफ दर्ज एफआईआर में विवेचना के दौरान उनके नाबालिग बेटे का नाम भी प्रकरण में जोड़ दिया गया था। हालांकि व्यापारी का कहना था कि यह एफआईआर ही झूठी है। और जब इस मामले में 16 अप्रैल 2026 को उन्हें थाने बुलाया गया तो वहां मौजूद दो मीडियाकर्मियों में से एक ने अपना नाम कमलेश बताते उनके नाबालिग बेटे का नाम मामले से हटाने के एवज में पहले एक लाख रुपए और बाद में 70 हजार रुपए की मांग की। उसने यह राशि थाना पुलिस के नाम पर मांगी थी।
व्यापारी की शिकायत अनुसार उसने मीडियाकर्मी से फोन पर हुई बातचीत की रिकॉर्डिंग की, जिसमें 70 हजार रुपए की मांग और पुलिस की ओर से मदद कराने का जिक्र किया गया है। इसके बाद 17 अप्रैल 2026 को लोकायुक्त कार्यालय इन्दौर पहुंचकर रिकॉर्डिंग सहित शिकायत दर्ज कराते उक्त रिकॉर्डिंग पेन ड्राइव में सौंप संबंधित लोगों के खिलाफ ट्रैप कार्रवाई करने की मांग की। लेकिन लोकायुक्त कार्यालय द्वारा ट्रैप कार्रवाई करने के बजाय उनके बयान दर्ज किए और रिकॉर्डिंग जब्त कर ली तथा संबंधित लोगों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। जब कुछ समय बाद उसी मीडियाकर्मी ने व्यापारी शेखर से मुलाकात कर कहा कि शिकायत की जानकारी उसे पहले ही मिल गई थी, जिससे वे सतर्क हो गए थे। तब शेखर को पूरी बात का पता चला और जिसके बाद व्यापारी ने लोकायुक्त संगठन के सर्वोच्च अधिकारियों से घटनाक्रम की उच्च स्तरीय जांच की मांग करते अनुरोध किया है कि यदि शिकायत की गोपनीय जानकारी लीक हुई है, तो जिम्मेदार अधिकारियों एवं कर्मचारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की जाए।
बता दें कि भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी की शिकायतें लोकायुक्त में की जाती हैं, लेकिन यह ऐसा मामला है, जिसमें एक शिकायतकर्ता ने लोकायुक्त संगठन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए लोकायुक्त भोपाल, उप-लोकायुक्त और डीजी लोकायुक्त को शिकायत भेजी गई है अब देखना यह है कि लोकायुक्त संगठन के उच्च अधिकारी अपने संगठन की इस सवालिया कार्यप्रणाली की शिकायत को लेकर क्या कदम उठाते है।
ज्ञात हो कि लोकायुक्त निजी व्यक्तियों के खिलाफ शिकायत पर कार्रवाई नहीं करता है। कानूनविदों के अनुसार यदि इस मामले में किसी लोक सेवक की रिकॉर्डिंग होती या पीड़ित की सीधे किसी लोक सेवक से बातचीत कराई जाती, तो मामला बन सकता था। यह मामला तो फ्रॉड या चीटिंग की श्रेणी का प्रतीत होता है, जिसकी शिकायत पुलिस से की जानी चाहिए थी। इस प्रकार के मामलों में लोकायुक्त सामान्यतः संज्ञान नहीं लेता है।

