औरतें जिन्दा रहेंगी 

काव्य ग़ज़ल

    वो कहते है

औरतें अलग हैं

जिनकी बेवाई फटती है

जिनके पांव जमीन नहीं छूते

जो ऑफिस जाती है

जो बच्चे पालती है

जो बरसीम काट कर लाती है

जो विदेश जाती है

जो पति के साथ रहती है

जो अकेले रहती है

जो झुकती है

जो तन जाती है

और बहुत सी

ये एक कैसे हुई।

     II 

ये सब जीवित बोलती हुई

हर दिन अपने हिस्से की लड़ाई करती हुई

औरतें है।

ये औरतें 

समाज को पसंद नहीं आती

    III

लड़कियां

जो बोलती है

किसे अच्छी लगती हैं।

पर लड़कियों

औरतों

तुम कहना

लिखना

बोलना

वो सब करना

जो तुम्हे जिंदा रखता है

अपने संघर्ष को किसी के जूते के नीचे मत आने देना

तुम आज मौन हुई

तो सदियां रोएंगी

हमारा इतिहास रौंद दिया जायेगा

ये हजारों वर्षों का कुचक्र टूटना चाहिए

इसलिए तुम्हे बोलना है

जिंदा रहना है।

– अपर्णा चौधरी रचना

सहायक आचार्या 

राजनीति विज्ञान विभाग 

इलाहाबाद विश्वविद्यालय