खंडहर हुआ घर

काव्य ग़ज़ल

माटी का यह घर कहे, सुन लो मेरी बात,

दीवारों में कैद हैं, अब गुजरी औकात॥

कभी जला चूल्हा यहाँ, गूँजी हँसी-मल्हार,

अब सन्नाटा ओढ़कर, बैठा सूना द्वार॥

बरसों की बरसात ने, छीनी इसकी शान,

टूटी छत से आज अब, झाँकता आसमान॥

पीढ़ी बदली, गाँव भी, बदले सब हालात,

माटी का यह घर कहे, सुन लो मेरी बात॥

खोये शहरी चमक में, अब तो गलियाँ गाँव।

सूनी चौखट पूछती, कहाँ गई वह छाँव॥

ईंट नहीं यह मात्र है, ये स्मृतियों का हार,

माटी के इस घर बसा, था पूरा संसार॥

बूढ़ी दीवारें कहें, कैसे वो मजबूर,

अपने ही आँगन हुए, अपनों से ही दूर॥

माटी की सौंधी महक, ढूँढ़े अपना गाँव,

आज खंडहर पूछता, कहाँ गई वह छाँव॥

-डॉ. सत्यवान सौरभ