कहते हैं, “हर दिमाग़ अपनी तरह से चमकता है।” ऐसे समय में जब समाज व्यक्तिगतता का जश्न मनाता है लेकिन उसे समझने में अक्सर संघर्ष करता है, कलर्स लेकर आ रहा है ‘जूही मुई’ एक दिल छू लेने वाली कहानी एक युवा ऑटिस्टिक लड़की की, जो ऐसे संसार में जी रही है जो उसे लगातार कम आंकता है। कहानी के केंद्र में है जूही सूरी एक तेज़ और उज्ज्वल युवती, जिसकी दुनिया को देखने का अनोखा तरीका उसकी सबसे बड़ी ताक़त भी है और सबसे बड़ी चुनौती भी।
कानून के चेंबर के अनुशासन में अपने भाई करण के साथ पली-बढ़ी जुही ने बचपन से ही अपने स्नेही पिता राजेंद्र सूरी को देखा, जो एक सम्मानित वकील हैं और अपनी खुद की प्रैक्टिस चलाते हैं। वह रोज़ाना जिस दुनिया से लड़ते हैं, उससे जुही को बचाकर रखते हैं। जुही का दिमाग़ कानून के लिए ही बना है उसे धाराएँ शब्दशः याद रहती हैं, वह मिसालों को तुरंत जोड़ लेती है और वे बारीकियाँ देख लेती है जो दूसरों की नज़र से छूट जाती हैं। पिता का ओवरप्रोटेक्टिव स्वभाव और भाई की नज़र में ‘जीनियस’ कहलाने वाली जुही को सामान्य तरीके से देखने वाला एकमात्र इंसान है इंस्पेक्टर सन्यम सिंह एक ज़मीन से जुड़ा, सहज प्रवृत्ति वाला पुलिस अफ़सर, जो उसका सबसे अप्रत्याशित साथी बनता है।

