सरदार सरोवर संबंधी आंतरराज्य विवाद के केंद्र की मध्यस्थता से हुए निराकरण पर सवाल का जवाब जरुरी! 

मध्य प्रदेश

 *7669 करोड़ रुपये की डूबक्षेत्र की वैध भरपाई तथा उर्वरित पुनर्वास के लिए 2900 करोड़ रु. के दावे की अनदेखी किस आधार पर?* 

 *मध्यप्रदेश सरकार कुछ हजार विस्थापितों के उर्वरित अधिकार देने का कार्य कैसे करेगी, यही सवाल!* 

सरदार सरोवर परियोजना के कारण मध्यप्रदेश में जलमग्न हुई वन भूमि, शासकीय भूमि तथा अन्य सार्वजनिक संसाधनों की भरपाई को लेकर वर्षों तक आंतरराज्य विवाद चला| गुजरात से कानूनन अपेक्षित वित्तीय सहायता की मांग मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र से भी जारी रही| इन मुद्दों पर केन्द्रीय गृहमंत्री और जल संपदा मंत्री की मध्यस्थता से समझौता किए जाने से गंभीर प्रश्न खड़े हो रहे है| इस समझौते का अधिकृत ब्यौरा नहीं लेकिन बड़ी खबरे प्रचारित हुई है! ख़बरों में कुछ विरोधाभास भी है| हम इसे पूर्ण परिप्रेक्ष्य में जानना और स्पष्टता लेना चाहते है| राज्य शासन के तथा विस्थापितों के अधिकार सुरक्षित रहे, यह भी अपेक्षित है! जब सरदार सरोवर बांध की ऊंचाई 90 मीटर तक 2000 से सीमित थी, तब मध्यप्रदेश सरकार ने परियोजना से होने वाली क्षति के लिए 281.46 करोड़ रुपये के मुआवजे की मांग की थी। इस राशि में वन क्षेत्र के लिए 112.51 करोड़ रुपये, सरकारी भूमि के लिए 157.61 करोड़ रुपये तथा जलमग्न वन भूमि के लिए 11.34 करोड़ रुपये शामिल थे। इसके बाद बांध की उंचाई 110 और 121.92 मी. तक बढ़ी| वर्ष 2014 से बांध की ऊंचाई बढ़ाकर 2017 में 138.68 मीटर कर दी गई। बांध की ऊंचाई बढ़ने के साथ मध्यप्रदेश में डूब क्षेत्र का विस्तार होता गया और बड़ी मात्रा में वन भूमि, सरकारी भूमि, कृषि क्षेत्र तथा अन्य प्राकृतिक संसाधन जलमग्न हुए। इससे राज्य को होने वाली क्षति पहले की तुलना में कई गुना बढ़ गई| विस्थापित गावों की संख्या, नियोजन अनुसार 192 और एक नगर यही साबित हुई, 2019 से! 2023 में पुनरीक्षित बैकवॉटर लेवल्स के आधार पर ‘पुनर्वास के लिए अपात्र’ घोषित किये हजारों परिवारों की ध्वस्तता हुई!

इसी वास्तविक स्थिति को ध्यान में रखते हुए मध्यप्रदेश सरकार ने जलमग्न भूमि और अन्य प्रभावित परिसंपत्तियों का पुनर्मूल्यांकन कराया। 2019 – 2020 संबंधित आधार पर तैयार इस पुनर्मूल्यांकन के अनुसार राज्य ने अपने डूबक्षेत्र की भरपाई के दावे को बढ़ाकर 7,669 करोड़ रुपये साबित किया| यह दावा बढ़े हुए डूब क्षेत्र और वर्तमान मूल्य के अनुरूप वरिष्ठ अधिकारीयों के द्वारा तैयार किया गया था। मध्यप्रदेश सरकार ने 10 फरवरी 2022 को अपना संशोधित भरपाई का दावा गुजरात सरकार को विधिवत प्रस्तुत किया|

इसके बावजूद लगभग दो वर्ष बाद 21 मार्च 2024 को गुजरात सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया कि वह केवल 281.46 करोड़ रुपये के मूल दावे पर ही विचार करेगी तथा 7,669 करोड़ रुपये के संशोधित दावे को स्वीकार नहीं करेगी। यह रुख न केवल मध्यप्रदेश शासन के अनुसार हुई वास्तविक क्षति की उपेक्षा, बल्कि परियोजना से प्रभावित राज्य के वैधानिक अधिकारों की भी अनदेखी मानकर म.प्र. शासन ने नामंजूर की! विवाद पर नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण की हर बैठक में चर्चा चलती रही| नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण  के 1979 से लागू रहे प्रावधानों के अनुसार परियोजना से प्रभावित राज्यों के बीच वन भूमि, सरकारी भूमि तथा पुनर्वास से संबंधित दायित्वों का निर्वहन किया जाना अनिवार्य रहा|

सर्वोच्च अदालत के 2000 से पारित फैसलों के अनुसार भी यही होना था| मध्यप्रदेश को उसके वैध अधिकारों के अनुरूप डूब क्षेत्र की उचित भरपाई तथा विस्थापन से प्रभावित प्रत्येक परिवार का न्यायपूर्ण पुनर्वास के लिए गुजरात से भुगतान करके सुनिश्चित किया जाना क़ानूनी बंधन रहा| आज भी मध्यप्रदेश के हजारों विस्थापित परिवार पूर्ण पुनर्वास की प्रतीक्षा कर रहे हैं| अनेक परिवारों को भूमी, आजीविका और पुनर्वास से जुड़े अपने वैधानिक अधिकार पूरी तरह प्राप्त नहीं हुए हैं| ऐसी स्थिति में राज्य सरकार ने 2900 करोड़ रु. की मांग उर्वरित पुनर्वास कार्य के लिए गुजरात से की| 

बीच में इस विवाद संबंधी म.प्र., महाराष्ट्र और गुजरात के वरिष्ठ अधिकारियों के बीच कई बैठके हुई| विवाद के निराकरण के लिए मध्यस्थता – समिति में भूतपूर्व अधिकारीयों को नियुक्त किया जाकर, गुजरात के प्रतिनिधीयों के साथ म.प्र. के डूबक्षेत्र की संयुक्त मुलाकात भी हुई| प्रथम खबर आयी, कि म.प्र. और गुजरात के मुख्य सचिवों के बीच हुई बैठक में गुजरात से म.प्र. को 10,000 करोड़ रु. देना तय हुआ| फिर भी प्रत्यक्ष लेनदेन नहीं हुई| फिर से दिनांक 06.06.2026 के रोज खबर आयी, मुख्य सचिवों के बीच गुजरात से म.प्र. को 7388 करोड़ रु. देने के निर्णय की, जिसे 30.06.2026 को अंतिम स्वरूप देना भी जाहीर हुआ|

जबकि 41 वर्ष चले अहिंसक सत्याग्रही और कानूनी प्रक्रिया के द्वारा तीनों राज्यों के करीबन 50,000 परिवारों को पुनर्वास का कम /अधिक लाभ मिलने पर भी म.प्र. में हजारों और महाराष्ट्र, गुजरात में प्रत्येकी सैंकडो परिवारों का, जिनमें आदिवासी, दलित, श्रमिक शामिल है; भूमीहीन मजदूर, कुम्हार, केवट, मछुआरे वंचित है; तो उनके पुनर्वास के लिए इस वित्तीय सहायता की राह देखते रहे संगठित विस्थापित!

इस परिप्रेक्ष्य में जो समझौता हुआ है, उसमें म.प्र. से बांध के निवेश पूंजी में तथा नियमित Operation & Maintenance – कार्य का संचालन और व्यवस्थापन में हिस्सा भी कुछ विवादित और कुछ मंजूर हुआ| इस विवाद का निराकरण दिल्ली में मा. गृहमंत्री और केंद्रीय जलसंपदा मंत्री के साथ चारो (म.प्र., महाराष्ट्र, राजस्थान और गुजरात) राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बैठक में होना एक ऐतिहासिक, संघात्मक राज्य व्यवस्था के तहत् समन्वय और हासिली बताया जा रहा है| इसमें ‘One Time Settlement’ हुआ, जिसके अनुसार मध्यप्रदेश को ही गुजरात को 550 करोड़ रु. का भुगतान करना और महाराष्ट्र ने 27 करोड़ रु. का भुगतान करना तय हुआ है!

किसी खबर अनुसार, यह हुआ है, सरदार सरोवर परियोजना की लागत और उसमें हर राज्य का हिस्सा बढ़ने से! परियोजना की 1983 में आंकी गयी लागत 4200 करोड, योजना आयोग की मंजूरी (1988) के वक्त मंजूर की 6400+ करोड़ की और बढ़ते बढते, गुजरात के मुख्यमंत्री अनुसार 75000+ करोड तथा भूत. मुख्यमंत्री सुरेश मेहता जी (जो भाजपा के मंत्री, जलविशेषज्ञ रहे) के अनुसार 90,000 करोड कैसे हुई? मूल नियोजन में खामियाँ थी, जिनकी गुजरात में और विश्वबैंक की नियुक्त आंतरराष्ट्रीय उच्चस्तरीय आयोग की रिपोर्ट में तथा सर्वोच्च अदालत के 18.10.2000 में तीन में से एक न्यायाधीश महोदय के अल्पसंख्य फैसले में स्पष्ट चर्चा हुई| इसके बाद गुजरात के विधानसभा सत्रों में हुई बजट पर चर्चा से जाहीर है कि स्टैच्यू ऑफ यूनिटी तथा उसके क्षेत्र में लायी गयी पर्यटन योजनाओं की लागत भी कभी 1055 करोड़ तो कभी-2015 में -915 करोड़ रु. जैसी बांध परियोजना की ही लागत से जोड़ी जाती रही| क्या इसकी वैधता पर जवाब मिलेगा? म.प्र. शासन ने हासिल की है स्पष्टता?

सबसे गंभीर यह भी है कि मध्यप्रदेश के हजारो विस्थापितों का उर्वरित पुनर्वास वैकल्पिक भूमी / अनुदान, मकान के लिए भूखंड / उसका रजिस्ट्रीकरण, भूखंडों का उर्वरित आबंटन तथा गृहनिर्माण के लिए गरीबों को 2017 से मान्य अनुदान, हर पुनर्वास स्थल पर उपलब्ध कराने की उर्वरित सुविधाएँ इ. कार्य, जिसके लिए 2900 करोड़ की मांग थी, वह न मिलने पर कैसे किया जाएगा? अॅटर्नी जनरल ने 2003 में ही सर्वोच्च अदालत में चली याचिका के वक्त, गुजरात शासन की ही भूअर्जन पुनर्वास की पूरी लागत-राशि का भुगतान महाराष्ट्र म.प्र. को करने का निर्णय और निर्देश दिया था| इसे ट्रिब्युनल फैसले के कानूनी आधार पर नकार नही सकते थे, नही सकते हैं, आज के अॅटर्नी जनरल या केंद्रीय मंत्री भी| इसीलिए हर राज्य का निवेश, परियोजना के लाभ के बदले में हिस्सा, परियोजना की सही लागत के आधार पर सत्यवादी तरीके से तय होना और पुनर्वास, भूअर्जन का सँपूर्ण खर्च गुजरात की ओर से भुगतान करना जरूरी है|

महाराष्ट्र शासन ने भी डूबग्रस्त वनभूमी (6488 हे.) के बदले में 1313+ करोड और उर्वरित पुनर्वास कार्य के लिए 300+ करोड़ रु. की मांग रखी| दोनो राज्यों को सरदार सरोवर से नियोजित म.प्र. – 56% और महाराष्ट्र को 27% निर्मित बिजली का लाभ परिपूर्णता से न मिलने पर, 900 और 450 करोड़ रु. की भरपाई की मांग भी रखते आये| मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र की मांग, बिजली निर्माण की नयी योजना को मंजुरी देते हुए, खारिज की जाने की बात तो जनवरी 2026 की बैठक में नोंद की गयी| महाराष्ट्र के हिस्से के जलनियोजन पर भी कई सवाल गंभीर है; जबकि नर्मदा का पानी, घाटी के गावों के आदिवासियों के हक सुनिश्चित न करते हुए, 8 परियोजनाओं से, विस्थापन और प्रकृति पर आघात के साथ, तापी की घाटी में ले जाने की योजना, संबंधित ग्रामसभाओं ने प्रस्तावों से विरोध दर्ज किया ही है, 2018 से; तो भी फिर से घोषित करने पर सवाल है! महाराष्ट्र का भी उर्वरित पुनर्वास कार्य, आदिवासियों की पात्रता के बावजूद, वित्तीय सहायता गुजरात से या राज्य शासन से ही न मिलने पर, वर्षों से प्रलंबित है|

हमारा मानना है कि मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र के वैध वित्तीय और पुनर्वास संबंधी अधिकारों से किसी भी प्रकार का समझौता राज्य और उसके लाखों प्रभावित नागरिकों के हितों के प्रतिकूल न रहे! उपलब्ध तथ्यों के आधार पर यह प्रतीत होता है कि किया गया समझौता राज्य के अहित में न हो| हम मध्यप्रदेश सरकार से मांग करते हैं कि वह राज्य के 7,669 करोड़ रुपये के वैध भरपाई के तथा, वन एवं सरकारी भूमि के उचित प्रतिकर तथा हजारों वंचित विस्थापित परिवारों के पूर्ण और न्यायसंगत पुनर्वास के लिए दृढ़ता से वित्तीय सहायता का अपना पक्ष रखे तथा उसके लिए आवश्यक होने पर उपलब्ध सभी वैधानिक और संवैधानिक उपायों का उपयोग करे|