…..नहीं डरता कोई ईश्वर से…

साहित्य

     सदियों से की गई हैं 

        औरतें निर्वस्त्र, 

      कभी सभाओं में 

      कभी देवालयों में,

समाज तब भी 

अपलक देखता था

उसके नग्न उभरे 

अंगों को वहशीपन टपकती 

आँखों से,

आज भी टुकुर- टुकुर 

      ही देखता है,

समाज पहले भी नपुंसक 

था, आज भी नपुंस्क है 

अपनी स्त्रियों की आबरू 

बचाने में,

      सुनो,

      नहीं डरता कोई भी 

       तुम्हारे निर्मित 

       ईश्वर से।

राजकुमारी ‘राजसी’