:: इंदौर में आज सम्मान समारोह; आपातकाल की यादों, संघर्ष और त्याग का दिखेगा इतिहास ::
इंदौर । आपातकाल के 50 वर्ष पूरे होने के अवसर पर लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष करने वाले लोकतंत्र सेनानी (मीसाबंदी) रविवार को इंदौर में फिर एक मंच पर जुटेंगे। खंडवा रोड स्थित अखंड परमधाम आश्रम में होने वाले भव्य मिलन एवं सम्मान समारोह में देश के विभिन्न राज्यों से आए लोकतंत्र सेनानियों का सम्मान किया जाएगा।
समारोह में आपातकाल के दौर की संघर्षगाथाएं, जेल यातनाओं के अनुभव और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए किए गए आंदोलनों की यादें ताजा होंगी। कार्यक्रम का प्रमुख आकर्षण आपातकाल पर आधारित प्रदर्शनी होगी, जिसमें 100 से अधिक दुर्लभ तस्वीरें और समाचार पत्रों की कतरनें प्रदर्शित की जाएंगी।
शनिवार से ही मध्यप्रदेश सहित उत्तर प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र से लोकतंत्र सेनानियों के इंदौर पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया। जयपुर के 101 वर्षीय पूर्व सांसद और लोकतंत्र सेनानी रामकिशन शर्मा भी देर शाम इंदौर पहुंचे।
आयोजन समिति के अध्यक्ष रामबाबू अग्रवाल ने बताया कि 25 जून 1975 को लागू आपातकाल के दौरान हजारों लोगों ने लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष किया। अनेक लोगों ने जेल यातनाएं सहीं और परिवार, रोजगार तथा व्यक्तिगत कठिनाइयों के बावजूद लोकतांत्रिक अधिकारों की आवाज बुलंद रखी। यह आयोजन उनके योगदान को स्मरण करने और नई पीढ़ी तक संघर्ष की गाथा पहुंचाने का प्रयास है।
समारोह रविवार सुबह 10.30 बजे शुरू होगा। मुख्य अतिथि कर्नाटक के राज्यपाल थावरचंद गहलोत होंगे। पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन, पूर्व राज्यपाल न्यायमूर्ति वीएस कोकजे, लोकतंत्र सेनानी संघ के प्रदेश अध्यक्ष तपन भोमिक, पूर्व सांसद रामकिशन शर्मा, पूर्व सांसद कृष्ण मुरारी मोघे और सांसद शंकर लालवानी सहित अनेक विशिष्ट अतिथि शामिल होंगे। इस अवसर पर लोकतंत्र सेनानियों को शाल, श्रीफल और प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया जाएगा।
प्रदर्शनी में आपातकाल के दौर के समाचार पत्रों की कतरनें, ऐतिहासिक तस्वीरें और घटनाओं से जुड़ी सामग्री दिखाई जाएगी। आयोजकों का उद्देश्य नई पीढ़ी को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए हुए संघर्ष से परिचित कराना है।
आयोजकों के अनुसार आपातकाल के दौरान इंदौर में करीब 165 और मध्यप्रदेश में चार हजार से अधिक मीसाबंदी रहे थे। समय के साथ अब इनमें से लगभग 30 प्रतिशत ही जीवित हैं। ऐसे में यह आयोजन केवल सम्मान नहीं, बल्कि साथियों के पुनर्मिलन और उनकी स्मृतियों को संजोने का अवसर भी है।
कार्यक्रम की शुरुआत गौ-सेवा और दिवंगत लोकतंत्र सेनानियों की स्मृति में पौधारोपण से होगी। समारोह में लोकतंत्र सेनानी अपने अनुभव साझा करेंगे, जिनमें गिरफ्तारी, भूमिगत संघर्ष और परिवारों की कठिनाइयों की यादें शामिल होंगी।
:: आपातकाल की दो यादें ::
- परीक्षा कक्ष से जेल तक रामबाबू अग्रवाल का सफर –
एमकॉम की परीक्षा चल रही थी। जून की एक दोपहर खबर मिली कि तत्कालीन एसपी सुरजीत सिंह ने वैश्वव कॉलेज को पुलिस बल से घेर लिया है। सायरन बजाती पुलिस की गाड़ियां पहुंची थीं, जैसे किसी बड़े अपराधी की तलाश हो रही हो। निशाने पर थे छात्र नेता रामबाबू अग्रवाल, जो डॉ. लोहिया के समाजवाद से प्रभावित होकर छात्र राजनीति में सक्रिय थे।
साथियों गुरुवचन छाबड़ा और सुभाष खंडेलवाल की सूझबूझ से वे पुलिस घेरे से बाहर निकल सके, लेकिन संघर्ष आगे भी जारी रहा। पुलिस ने उनके पिता को हिरासत में लिया, घर की बिजली काट दी और स्कूटर तक जब्त कर लिया। परिवार पर दबाव बढ़ता गया। उनकी पत्नी और कल्याण जैन की पत्नी को रोज थाने में हाजिरी देनी पड़ती थी।
आखिरकार छावनी चौक में उन्होंने गिरफ्तारी दी। दो साल से अधिक समय जेल में बिताया, लेकिन हौसला नहीं टूटा। जेल की दीवारों के बीच भी उनके होंठों पर इंकलाब के गीत और आंखों में लोकतंत्र की उम्मीद कायम रही। - दादी के एक वाक्य ने दिया संघर्ष का हौसला –
25 जून 1975 की रात आपातकाल लागू हुआ तो पुलिस सुभाष खंडेलवाल के घर पहुंची। वे उस समय इंदौर से बाहर थे। पुलिस ने उनके पिता को हिरासत में ले लिया और कहा कि बेटा लौटकर गिरफ्तारी देगा, तभी उन्हें छोड़ा जाएगा।
सुभाष घर लौटे और गिरफ्तारी देने की तैयारी करने लगे। माहौल भावुक था। पिता को ले जाते समय दादी ने बहू से मालवी अंदाज में कहा- लाड़ी! तू क्यों रो रही है? तेरो छोरो (पति) जा रयो है, पर मेरो तो पोतो (सब कुछ) जा रयो है।
सुभाष ने पूछा कि दादी, आपको तो बेटा ज्यादा प्यारा होगा? दादी ने उन्हें गले लगाकर कहा- ना रे छोरा! मूल से ब्याज ज्यादा प्यारो होवे हे।
आपातकाल की ये स्मृतियां बताती हैं कि लोकतंत्र की लड़ाई केवल सड़कों और जेलों में नहीं, बल्कि घरों के आंगनों में भी लड़ी गई थी।

