क्लोजर रिपोर्ट वापस ले दुबारा जांच के कलेक्टर आदेश को कोर्ट ने किया रद्द,

इंदौर

विधि शासन के लिए घातक कहते मजिस्ट्रेट के न्यायिक अधिकारों पर कार्यपालिका का अतिक्रमण बताया

इन्दौर मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय खंडपीठ इन्दौर में जस्टिस जय कुमार पिल्लई की एकल पीठ ने जिला कलेक्टर द्वारा आपराधिक मामले में पुलिस द्वारा दायर क्लोज़र रिपोर्ट वापस ले दोबारा जांच के आदेश के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई उपरांत एक नजीर और महत्वपूर्ण निर्णय फैसला सुनाते कलेक्टर द्वारा जारी उन आदेशों को रद्द कर दिया । कोर्ट ने अपने इस महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि जिला कलेक्टर को किसी आपराधिक मामले में पुलिस को क्लोजर रिपोर्ट वापस लेने या जांच दोबारा शुरू करने का आदेश देने का अधिकार नहीं है। कोर्ट स्पष्ट कहा कि ऐसा करना मजिस्ट्रेट के न्यायिक अधिकारों में कार्यपालिका के हस्तक्षेप के समान होगा, जो विधि के शासन के विपरीत है। जस्टिस जय कुमार पिल्लई की सिंगल बेंच ने यह टिप्पणी सितंबर 2025 में जिला कलेक्टर द्वारा जारी उन आदेशों को रद्द करते हुए की, जिनमें कोतवाली थाना प्रभारी को क्लोजर रिपोर्ट वापस लेकर मामले की दोबारा जांच करने का निर्देश दिया गया था।
मामले में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 420, 467, 468 और 471 के तहत FIR दर्ज की गई। जांच पूरी होने के बाद पुलिस को आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिले, जिसके आधार पर मई 2024 में क्लोजर रिपोर्ट सक्षम अदालत के समक्ष भेज दी गई। इसके बाद जिला कलेक्टर ने आदेश जारी कर पुलिस को जांच दोबारा शुरू करने और क्लोजर रिपोर्ट वापस लेने के निर्देश दिए। याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) के तहत जिला कलेक्टर को न तो जांच में हस्तक्षेप करने का अधिकार है और न ही अदालत में भेजी जा चुकी क्लोजर रिपोर्ट वापस लेने का निर्देश देने का।
वहीं, राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि कलेक्टर का उद्देश्य निष्पक्ष और प्रभावी जांच सुनिश्चित करना था। इसके लिए CrPC की धारा 173(8) का हवाला दिया गया, जो आगे की जांच की अनुमति देती है। हाईकोर्ट ने कहा कि CrPC में जांच एजेंसी और न्यायपालिका की शक्तियां स्पष्ट रूप से निर्धारित हैं। FIR दर्ज होने के बाद पुलिस जांच करती है और यदि पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिलते तो क्लोजर रिपोर्ट मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत करती है। इसके बाद निर्णय लेने का अधिकार केवल मजिस्ट्रेट के पास होता है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसी स्थिति में मजिस्ट्रेट के पास तीन विकल्प होते हैं क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार करना, उसे अस्वीकार कर संज्ञान लेना, या आगे की जांच का निर्देश देना। अदालत ने कहा, यह सही है कि पुलिस को CrPC की धारा 173(8) के तहत आगे की जांच करने का स्वतंत्र अधिकार है लेकिन यह अधिकार जिला कलेक्टर के कार्यपालिका संबंधी आदेश पर प्रयोग नहीं किया जा सकता। जिला कलेक्टर के पास ऐसी कोई पर्यवेक्षी, अपीलीय या न्यायिक शक्ति नहीं है कि वह थाना प्रभारी को पहले से अदालत भेजी जा चुकी क्लोजर रिपोर्ट वापस लेने के लिए बाध्य करे। ऐसा करना मजिस्ट्रेट के न्यायिक अधिकारों पर कार्यपालिका का अतिक्रमण होगा जो विधि के शासन के लिए घातक है। हाईकोर्ट ने कहा कि जिला कलेक्टर द्वारा जारी आदेश CrPC की पूरी व्यवस्था के विपरीत हैं और उन्हें कानून में कोई आधार प्राप्त नहीं है। इन्हीं कारणों से अदालत ने याचिका स्वीकार करते हुए जिला कलेक्टर द्वारा जारी सभी संबंधित आदेशों और ज्ञापनों को रद्द किया।