मनुस्मृति क्या है 

साहित्य

अरविंद ‘कुमारसंभव’ 

इन वर्षों में मनुस्मृति की बहुत ज्यादा चर्चा हो रही है और वो भी अच्छे अर्थों में नहीं। जनमानस सैंकड़ों वर्षों से मनुस्मृति को भूल चुका था लेकिन संयोगवश भारतीय समाज का एक वर्ग इस पुस्तक का विरोध करके इसे सतत चर्चा में बनाये हुए है और इसका सबसे बड़ा खरीदार भी बना हुआ हैं।‌ आम हिंदू के घर शायद ही यह पुस्तक मिलेगी ठीक वैसे ही जैसे वेद उपनिषद नहीं मिलते हैं। 

अब जिज्ञासा इस बात की है कि क्या मनुस्मृति समाज को बांटने वाली और ब्राह्मण वाद को पोषित करने वाली है। उत्तर है नहीं। मूल मनुस्मृति में ऐसा नहीं है। उसमें छठी से बारहवीं शताब्दी के मध्य काल में जब पुराणों में संशोधन किया जा रहा था तभी ब्राह्मणों के एक वर्ग ने इसमें बहुत से प्रक्षिप्त अंश जोड़ दिये जिनमें कहीं कहीं ब्राह्मण वर्ग की सर्वोच्चता दिखाई दे जाती है और वर्ण व्यवस्था को विकृत किया गया है। लेकिन इस क्रम में भी मनुस्मृति में मूल श्लोक बने रहे जिससे इस विरोधाभास को पकड़ा जा सकता है। स्मरण रहे कि गरुड़ पुराण, भविष्य पुराण, स्कंद पुराण और पद्म पुराण भी नवीं से बारहवीं शताब्दी के मध्य लिखी गईं थीं। 

हक़ीक़त में मनुस्मृति एक अद्भुत ग्रंथ है जिसका पूरे विश्व में कोई सानी नहीं है। यह राजा और ब्राह्मण को अपने कठोर दायित्व बतलाता है, उन्हें कर्तव्य और दंड बोध में जकड़ता है और दूसरी ओर वैश्य तथा शूद्र के सही सही और व्यवहारिक कर्मों की भी विवेचना करता है। मनुस्मृति जन्म आधारित वर्ण व्यवस्था की बात ही नहीं करता। वह स्पष्ट कहता है कि अपने कर्म, आचरण, शिक्षा और योग्यता से एक ब्राह्मण का पुत्र शूद्र वर्ग में धकेला जा सकता है और इन्हीं गुणों के कारण एक शूद्र का पुत्र ब्राह्मण बन सकता है:-

शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम् ।क्षत्रियाज् जातमेवं तु विद्याद् वैश्यात् तथैव च ॥ ६५ 

जन्मना जायते शूद्र: कर्मणा द्विज उच्यते। ( स्कंद पुराण)

“जन्म से सभी शूद्र होते हैं, कर्म ( संस्कार ) के आधार पर उनका नया वर्ण होता है अतः सभी द्विज कहलाते हैं”।

इतने क्रांतिकारी विचार क्या किसी और ग्रंथ में हैं। वह कहता है कि वो कोई भी व्यक्ति ब्राह्मण कहलाया जा सकता है जिसमें ब्राह्मणत्व के दस गुण या लक्षण हों:-

धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः। धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥ (अध्याय 6, श्लोक 92)

धर्म के 10 लक्षण हैं—धैर्य, क्षमा, मन पर नियंत्रण, चोरी न करना, पवित्रता, इंद्रियों को वश में रखना, बुद्धि, विद्या, सत्य और क्रोध न करना।

यह ग्रंथ दंड के मामले में भी शूद्र के मुकाबले क्षत्रियों, ब्राह्मणों और वैश्यों के प्रति ज्यादा कठोर है और कई गुना ज़्यादा दंड प्रस्तावित करता है। हालांकि बाद के प्रक्षिप्त श्लोकों में दंड व्यवस्था ब्राह्मणों के लिए उदार और शूद्रों के लिए कठोर बना दी गई जो विरोधाभासी है। ठीक इसी तरह मनु स्त्रियों के सम्मान से वंश -कुल की कीर्ति में वृद्धि की बात करते हैं और विवाह में उनकी स्वीकृति तथा विधवा विवाह के समर्थन जैसी क्रांतिकारी बात करते हैं। वह समाज के विकृत तत्वों से स्त्रियों को सुरक्षा देने का दायित्व बचपन में पिता – भाई, विवाहोपरांत पति तथा वृद्धावस्था में पुत्र पर डालते हैं। यह दायित्व आज भी बना हुआ है और इसका निर्वहन भी किया जाता है भले ही आज की महिला कितनी ही सबल, आधुनिक और स्वावलंबी हो गई हो। 

प्रजनार्थं महाभागाः पूजार्हा गृहदीप्तयः । स्त्रियः श्रियश्च गेहेषु न विशेषोऽस्ति कश्चन ॥

 भावार्थ – स्त्रियां सन्तान को उत्पन्न करके वंश को आगे बढ़ाने वाली हैं , स्वयं सौभाग्यशाली हैं और परिवार का भाग्योदय करने वाली हैं , वे पूजा अर्थात् सम्मान की अधिकारिणी हैं , प्रसन्नता और सुख से घर को प्रकाशित या प्रसन्न करने वाली हैं । अर्थात् स्त्रियां घर की लक्ष्मी और शोभा हैं ।[16]

मनु पूरे जीवन चक्र के दौरान किये जाने वाले व्यवहारों को बतलाते हैं।‌ हवन, यज्ञ, तर्पण, वानप्रस्थ, संन्यास आदि की विधि बतलाते हैं। विभिन्न तरीके के विवाहों को स्वीकृति देते हैं, गुरु के प्रति शिष्य, प्रजा के प्रति राजा और माता-पिता के प्रति पुत्र के कर्तव्यों को परिभाषित करते हैं। 

मूल मनुस्मृति में चार वर्ण के अलावा अन्य किसी वर्ण को मान्यता नहीं दी गई है और आज जो जातियां दिखाई दे रही हैं उनका तब के समय में कोई अस्तित्व नहीं था। चारों वर्णों के इतर लोग वर्णसंकर कहलाते थे और उनमें से ज्यादातर तत्कालीन भारत के पश्चिमी भाग में जिसे आज हम पाकिस्तान अफगानिस्तान कहते हैं, में रहते थे। महाभारत में इनका अच्छे से विवरण दिया गया है।‌

 मनुस्मृति को लेकर जहां आपत्ति है वे बहुत सीमित संख्या में श्लोक हैं और बौद्ध धर्म के कमज़ोर होने और ब्राह्मणों का वर्चस्व बढ़ने के दौरान प्रक्षिप्त किये गये हैं। उनमें शास्त्र अध्ययन के लिए शूद्र को प्रतिबंधित करना, ब्राह्मणों को अपराध के लिए दंड में शिथिलता देना, वर्ण-व्यवस्था को जन्म आधारित दिखाने का प्रयास करना, शूद्रों का एकमात्र कार्य अन्य तीन वर्णों की सेवा करना , मांसाहार को प्रतिबंधित करना जबकि पहले के श्लोकों में मनु मांसाहार के बारे में किसका मांस अच्छा और किसका ख़राब है इस बारे में लिख चुके हैं।‌ मनु छुआछूत के बारे में वर्ण को नहीं अपितु शारीरिक स्वच्छता तथा संक्रमण से बचाव वाले कारण को ही महत्व देते हैं और केवल मृतक पशुओं के चर्म का कार्य करने वाले, मृतकों का दाह-संस्कार कराने वाले और स्नान रहित विभत्स भेष धारी चांडाल से गृहस्थों और संन्यासियों को दूर रहने का निर्देश देते हैं। और यह निर्देश चारों वर्णों के लिए है। केवल ब्राह्मणों के लिए नहीं। 

मनुस्मृति में सृष्टि का जन्म, प्रकृति चक्र, जीवन चक्र, जीवन के बाद का चक्र आदि विषयों पर भी बहुत गंभीरता से लिखा गया है। 

मनुस्मृति को समझना बेहद आसान है। जिन जिन निर्देशों में विरोधाभास है अर्थात एक श्लोक किसी व्यवस्था के बारे में सकारात्मक बोलता है और दूसरा नकारात्मक तो समझ जायें कि दूसरा वाला प्रक्षिप्त है। वर्तमान में जो मनुस्मृति मिलती है दरअसल वह बंगाल ( गौड़ प्रदेश) और ओडिशा में चलन में थी और वहीं से लेकर अंग्रेज विद्वान विलियम जोन्स ने अठारहवीं शताब्दी में इसका अंग्रेजी अनुवाद किया और फ़िर वहां से हिंदी में अनुदित होकर यह उत्तर भारतीय लोगों तक पहुंची। आद्य शंकराचार्य जी के समय में यह काशी में चलन में होती तो वो या उनका कोई शिष्य अवश्य इसपर टीका लिखते।‌

मनुस्मृति एवं याज्ञवल्क्य स्मृति ( मिताक्षरी टीका) ब्रिटिश काल में पूर्वी भारत में अनेक मुकदमों में सबूत के तौर पर मान्य रहे हैं और काशी के पंडितों ने भी रियासतों के समय में इसे आधार बनाकर कुछ निर्णय किए थे जिनमें शिवाजी का राज्याभिषेक, सवाई जयसिंह द्वारा अश्वमेध यज्ञ करने और विभिन्न राजाओं द्वारा लंदन में सम्राट की ताजपोशी में भाग लेने के लिए समुद्र पार जाने की अनुमति आदि शामिल थे। ब्रिटिश काल में ही पटना, कलकत्ता, इलाहाबाद के न्यायालयों के सम्मुख आये जाति निर्धारण और उत्तराधिकार संबंधित अनेक विवादों में भी ये दोनों ग्रंथ संदर्भ के रूप में रखे गए थे और न्यायालय द्वारा स्वीकार किए गए थे। 

तो मूल मनुस्मृति एक अद्भुत एवं पठनीय ग्रंथ है हालांकि आज के प्रगतिशील और गैर राजतंत्र माहौल में इसके ज्यादातर निर्देश अव्यवहारिक हैं।  

——-कुमारसंभव