‘हाउस हसबैंड’ : पुरुष की अस्मिता, गृहस्थ जीवन और आत्मस्वीकृति का संवेदनशील आख्यान
हाउस हसबैंड सुरजीत मान जलईया सिंह का ऐसा समकालीन उपन्यास है जो परिवार और समाज में पुरुष की पारंपरिक भूमिका पर एक जरूरी प्रश्न खड़ा करता है। उपन्यास का केंद्रीय पात्र मान परिस्थितियों के कारण घर की जिम्मेदारियाँ सँभालता है, जबकि उसकी पत्नी मोनिका पेशेवर जीवन में सक्रिय रहती है। यहीं से कथा केवल पति-पत्नी के संबंध की कहानी न रहकर पुरुष-अस्मिता, सामाजिक पूर्वाग्रह, वर्ग-बोध, पारिवारिक अपेक्षाओं, प्रेम, आत्मसम्मान और आत्मस्वीकृति की गहरी मनोवैज्ञानिक यात्रा बन जाती है। लेखक ने स्पष्ट किया है कि उनका उद्देश्य समकालीन मध्यमवर्गीय परिवार की संरचना और उसमें पुरुष के भीतर चलने वाली मानसिक यात्रा को सामने लाना था।
उपन्यास का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है—क्या पुरुष की पहचान केवल उसकी नौकरी, आय, पद और सामाजिक प्रतिष्ठा से निर्धारित होती है?
सामान्य सामाजिक व्यवस्था में पुरुष से कमाने वाले, परिवार का आर्थिक आधार बनने और बाहरी दुनिया में अपनी उपयोगिता सिद्ध करने की अपेक्षा की जाती है। जब वही पुरुष घर सँभालता है, बच्चों की देखभाल करता है और घरेलू जिम्मेदारियाँ निभाता है, तो समाज उसके श्रम को उसी सम्मान से नहीं देखता।
लेखक ने इसी विडंबना को उपन्यास का आधार बनाया है। लेखक की दृष्टि में घर सँभालना निष्क्रियता नहीं, बल्कि एक ऐसी जिम्मेदारी है जिसमें श्रम के साथ-साथ मानसिक दबाव और आत्मसंघर्ष भी है। इस दृष्टि से हाउस हसबैंड केवल ‘घर में रहने वाले पति’ की कथा नहीं है; यह मनुष्य के मूल्यांकन के सामाजिक पैमानों पर प्रश्नचिह्न लगाने वाला उपन्यास है।
मान उपन्यास का सबसे सशक्त और जटिल चरित्र है। वह न तो आदर्श नायक है और न ही विद्रोही नायक। वह एक सामान्य व्यक्ति है, जिसके भीतर अहंकार, असुरक्षा, प्रेम, जिम्मेदारी, आकांक्षा, पीड़ा और आत्मसम्मान सभी साथ-साथ मौजूद हैं। उसका सबसे बड़ा संघर्ष बाहरी समाज से अधिक अपने भीतर है। नौकरी और सामाजिक प्रतिष्ठा से जुड़ी पहचान खोने के बाद उसे स्वयं से पूछना पड़ता है कि—“मैं क्या करता हूँ?” यह छोटा-सा प्रश्न उसके लिए धीरे-धीरे अस्तित्वगत प्रश्न बन जाता है। उपन्यास में उसकी मानसिक स्थिति को डायरी, आत्मसंवाद और मौन के माध्यम से उभारा गया है। ‘भीतरी कोठरी’ इसी अंतर्मन का प्रतीक बन जाती है। वहाँ उसके डर, अधूरी आकांक्षाएँ और अतीत सुरक्षित हैं।
मान की यात्रा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अंत में वह समाज से प्रमाणपत्र माँगना छोड़ देता है। वह समझता है कि मनुष्य का वास्तविक मूल्य उसके कर्म, संवेदना और संबंधों में है।
मोनिका उपन्यास का दूसरा महत्वपूर्ण स्तंभ है। वह केवल ‘कमाने वाली पत्नी’ नहीं है। वह संवेदनशील, समझदार और अपने निर्णयों के प्रति सजग स्त्री के रूप में सामने आती है। मान और मोनिका का संबंध आरंभ में प्रेम, विश्वास और साझेदारी पर आधारित है, लेकिन परिस्थितियाँ धीरे-धीरे इस संबंध की परीक्षा लेती हैं। मोनिका के सामने एक ओर उसका पेशेवर जीवन है और दूसरी ओर पति तथा परिवार। यही द्वंद्व उपन्यास में आधुनिक दांपत्य की वास्तविक जटिलता को सामने लाता है।
लेखक का उद्देश्य पुरुष और स्त्री में से किसी एक को श्रेष्ठ सिद्ध करना नहीं है। उपन्यास किसी पुरुष या महिला को किसी एक भूमिका में बाँधने के लिए नहीं, बल्कि जीवन की वास्तविकताओं, घरेलू जिम्मेदारियों और प्रेम के जटिल स्वरूप को सामने लाने के लिए है। इसलिए मोनिका और मान का संबंध प्रतिस्पर्धा नहीं, साझेदारी की ओर बढ़ता है।
उपन्यास का आरंभ ‘प्रेम विवाह’ से होता है। मान और मोनिका का संबंध केवल आकर्षण पर आधारित नहीं है; उनके बीच विचारों और संवेदनाओं का मेल है। लेकिन लेखक प्रेम को केवल रोमांटिक भावना मानकर नहीं चलते। उपन्यास में प्रेम का अर्थ धीरे-धीरे बदलता है—
आकर्षण → विश्वास → त्याग → समझ → साझेदारी → आत्मस्वीकृति। यही परिवर्तन उपन्यास की भावात्मक रीढ़ है।
प्रेम के संबंध में मान की डायरी का विचार विशेष रूप से महत्वपूर्ण है कि प्रेम व्यक्ति को उसके अहं से बाहर निकालकर ‘मैं’ से ‘हम’ की ओर ले जाता है। इस तरह प्रेम यहाँ केवल भावनात्मक संबंध नहीं, बल्कि व्यक्तित्व के परिष्कार की प्रक्रिया है।
‘करवट’ अध्याय में उपन्यास की नायिका मोनिका को नौकरी मिलना कथा में महत्वपूर्ण मोड़ पैदा करता है। एक ओर मोनिका के लिए नौकरी उसकी पहचान और स्वतंत्रता से जुड़ी है, दूसरी ओर मान के लिए उसका अर्थ साथ रहने की समस्या से जुड़ जाता है। यहाँ उपन्यास किसी आसान समाधान की ओर नहीं जाता। दोनों के सामने ऐसी स्थिति है जिसमें किसी एक के निर्णय को पूरी तरह सही या दूसरे को गलत नहीं कहा जा सकता। यही उपन्यास की यथार्थवादी शक्ति है—जीवन में कई बार दो सही इच्छाएँ आपस में टकराती हैं।
मान मोनिका की नौकरी रोकना नहीं चाहता, क्योंकि वह जानता है कि ऐसा करने पर उसके भीतर अधूरेपन की भावना रह जाएगी। यह निर्णय मान के प्रेम को त्याग और समझ में बदल देता है।
‘अभिशप्त’ उपन्यास का प्रतीकात्मक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय है। लेखक महाभारत के शाप-प्रसंगों को आधुनिक जीवन की सामाजिक मानसिकता से जोड़ते हैं। यहाँ प्राचीन ‘श्राप’ आधुनिक समाज के ताने, आरोप, संदेह और मानसिक दबाव में बदल जाता है। नए शहर में भी मान और मोनिका सामाजिक निगाहों से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाते। पड़ोस, परिचित और कार्यस्थल—हर जगह उनकी वैवाहिक व्यवस्था को सामान्य सामाजिक ढाँचे से अलग समझा जाता है। इस अध्याय की विशेषता यह है कि लेखक दिखाते हैं कि आज श्राप मंत्रों से नहीं, बल्कि शब्दों, निगाहों और सामाजिक निर्णयों से दिए जाते हैं।
उपन्यास का सबसे प्रभावशाली पक्ष पुरुष की उस पीड़ा को सामने लाना है जिसके बारे में समाज बहुत कम बात करता है। मान को घर में रहने के कारण अनेक प्रकार के ताने सुनने पड़ते हैं। उसकी पुरुषत्व की सामाजिक परिभाषा पर प्रश्न उठाए जाते हैं। उसकी आर्थिक भूमिका कम होने के साथ उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा भी कम आँकी जाती है। लेखक इस मानसिक हिंसा को केवल संवादों से नहीं, बल्कि मान के भीतर उठते विचारों के माध्यम से प्रस्तुत करता है। यहाँ उपन्यास का प्रश्न अत्यंत गंभीर है—
यदि घर सँभालना स्त्री के लिए सम्मानजनक जिम्मेदारी है, तो वही काम पुरुष के लिए अपमान का कारण क्यों बन जाता है? यही प्रश्न हाउस हसबैंड को समकालीन सामाजिक विमर्श का महत्वपूर्ण उपन्यास बनाता है।
दांपत्य संबंधों का एक अत्यंत सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक पक्ष ‘संशय की छाया’ में सामने आता है। उपन्यास कहता है कि संदेह की सबसे खतरनाक परिणति संवाद का समाप्त होना है। पति-पत्नी एक ही घर में रहते हुए भी भीतर से दूर हो सकते हैं। यहाँ लेखक का मनोवैज्ञानिक अवलोकन प्रभावशाली है। रिश्ते हमेशा किसी बड़े झगड़े से नहीं टूटते; कई बार वे छोटी-छोटी चुप्पियों और अनकहे प्रश्नों से कमजोर होते हैं।
‘अजनबी की तरह साथ’ यह अध्याय उपन्यास की मनोवैज्ञानिक संवेदना को और गहरा करता है।
पति-पत्नी साथ रहते हैं, लेकिन संवाद कम हो जाता है। एक-दूसरे के साथ होते हुए भी दोनों के भीतर अलग-अलग संसार बनने लगते हैं। लेखक का विचार है—“मौन भी एक संवाद हो सकता है।” यह पंक्ति पूरे उपन्यास के दांपत्य-विमर्श की कुंजी कही जा सकती है। कभी मौन प्रेम का रूप है, कभी पीड़ा का, कभी दूरी का और कभी समझ का।
‘पुरुष की तनहाई’ शीर्षक स्वयं उपन्यास के मूल संकट को व्यक्त करता है। पुरुष से समाज मजबूत होने की अपेक्षा करता है। उसे रोने, असफल होने, डरने या निर्भर होने की अनुमति बहुत कम मिलती है। मान के माध्यम से लेखक उस पुरुष को आवाज देते हैं जो बाहर से सामान्य दिखाई देता है, लेकिन भीतर से लगातार अपनी उपयोगिता और पहचान को लेकर संघर्ष कर रहा है। यहाँ उपन्यास पुरुष-विमर्श को स्त्री-विरोधी नहीं बनाता, बल्कि मानवीय विमर्श में बदल देता है।
‘ख्वाहिशों की धीमी मौत’ में मान की कई व्यक्तिगत आकांक्षाएँ धीरे-धीरे समाप्त होती हैं। लेकिन लेखक इस मृत्यु को केवल हार नहीं मानते। उनके अनुसार यह एक नई चेतना और स्वीकृति का जन्म भी है।
यही उपन्यास की दार्शनिक भूमि है—
“कुछ सपनों का समाप्त होना हमेशा जीवन का समाप्त होना नहीं होता।”
“कभी-कभी व्यक्ति अपनी पुरानी आकांक्षाओं से आगे बढ़कर जीवन का नया अर्थ खोजता है।”
‘वह दिन जब रोटी जल गई थी’ यह उपन्यास की सबसे सुंदर प्रतीकात्मक घटनाओं में से एक है।
रोटी जल जाना सामान्य घरेलू घटना है, लेकिन लेखक इसे पुरुष-अहं और घरेलू जिम्मेदारी के टकराव का प्रतीक बनाते हैं। लेखक स्वयं स्पष्ट करते हैं कि यह घटना केवल घरेलू असफलता नहीं, बल्कि समाज और पुरुष-अहंकार के बीच टकराव का प्रतीक है। यहीं से मान के लिए घर के काम केवल ‘काम’ नहीं रहते, बल्कि आत्मबोध का माध्यम बनने लगते हैं। रोटी का जलना इस बात का प्रतीक बन जाता है कि संपूर्णता की अपेक्षा से अधिक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाने का साहस है।
‘भीतरी कोठरी’ उपन्यास का सबसे गहरा प्रतीक है। यह केवल घर का कोई कमरा नहीं है। यह मान के अवचेतन और अंतर्मन का प्रतीक है—जहाँ उसके अतीत, पिता से जुड़े अनुभव, डर, अधूरी इच्छाएँ और आत्मसंघर्ष जमा हैं। लेखक स्वयं बताता है कि ‘भीतरी कोठरी’ मान के अतीत और पिता के साथ संबंध के माध्यम से उसकी आत्मा की गहराई और मनोवैज्ञानिक यात्रा को उजागर करती है। इस दृष्टि से घर की बाहरी कोठरी और मन की भीतरी कोठरी एक-दूसरे की प्रतीकात्मक प्रतिछवियाँ बन जाती हैं।
उपन्यास का एक अत्यंत प्रभावशाली विमर्श ‘समाज की अदालत’ है। समाज व्यक्ति को बिना पूरी कहानी जाने सफल-असफल, योग्य-अयोग्य और सम्मानित-असम्मानित घोषित कर देता है। मान धीरे-धीरे समझता है कि समाज के इस निर्णय से अधिक महत्वपूर्ण स्वयं के भीतर का न्याय है। डायरी में उसका आत्मबोध इसी दिशा में आगे बढ़ता है—“असली न्याय और सम्मान मैं अपने भीतर खोज सकता हूँ।” यही उपन्यास का सबसे महत्वपूर्ण संदेश है।
उपन्यास के उत्तरार्ध में मान की पहचान पूरी तरह बदलने लगती है। अब वह अपने मूल्य को नौकरी से नहीं जोड़ता। मोनिका भी उसके योगदान को नए दृष्टिकोण से देखती है। वह समझती है कि मान घर में केवल समय नहीं काट रहा, बल्कि बच्चों, परिवार और रिश्ते के लिए जिम्मेदारी निभा रहा है। मोनिका का कथन—“यह भी काम है।” पूरे उपन्यास की सामाजिक चेतना को एक वाक्य में समेट देता है। यहीं ‘हाउस हसबैंड’ शब्द अपमानजनक सामाजिक पहचान से बदलकर सम्मानजनक पारिवारिक भूमिका बन जाता है।
‘घर की धड़कन’ उपन्यास के सबसे मार्मिक अध्यायों में से है।मान को एहसास होता है कि घर केवल दीवारों, फर्नीचर और सजावट से नहीं बनता। घर बच्चों की हँसी, पत्नी के विश्वास, रोजमर्रा के श्रम और पारस्परिक स्नेह से बनता है। अंततः उसका आत्मबोध इस रूप में सामने आता है—“मैं अब घर की धड़कन हूँ।” यह कथन उपन्यास के शीर्षक को भी नया अर्थ देता है।
रसोई, जिसे सामान्यतः घरेलू श्रम का स्थान माना जाता है, उपन्यास में अंततः सम्मान और आत्मस्वीकृति की जगह बन जाती है। सुबह की धूप का रसोई में प्रवेश करना मान के लिए केवल प्राकृतिक दृश्य नहीं, बल्कि नई शुरुआत का प्रतीक है। यहाँ ‘रोशनी’ तीन स्तरों पर अर्थ देती है—अज्ञान से ज्ञान की ओर, अपमान से आत्मसम्मान की ओर तथा अकेलेपन से साझेदारी की ओर। इसलिए रसोई, जो पहले सामाजिक दृष्टि में ‘घर का काम’ थी, अंत में जीवन की गरिमा का प्रतीक बन जाती है।
‘धीरे-धीरे वापसी’ उपन्यास का अंतिम भाव किसी नाटकीय विजय का नहीं, बल्कि धीरे-धीरे प्राप्त हुई आंतरिक शांति का है। मान अब समाज को अपनी उपयोगिता साबित करने के लिए बेचैन नहीं है। वह अधिक धैर्यवान हो गया है, अधिक सुनता है और कम साबित करने की कोशिश करता है। यही ‘वापसी’ है—किसी बाहरी पद पर नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर वापसी।
उपन्यास अंततः यह कहता है कि मनुष्य की कीमत उसकी भूमिका से नहीं, उसके मानवीय गुणों से तय होनी चाहिए। मान की यात्रा ‘नौकरी करने वाले पुरुष’ से ‘घर सँभालने वाले पुरुष’ और वहाँ से ‘अपने जीवन को स्वीकार करने वाले मनुष्य’ तक की यात्रा है। उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं कि समाज ने उसे स्वीकार कर लिया, बल्कि यह है कि उसने स्वयं को स्वीकार कर लिया। इसीलिए उपन्यास का अंतिम दर्शन बाहरी सफलता के स्थान पर आंतरिक शांति को महत्व देता है। लेखक भी स्पष्ट करते हैं कि जीवन की वास्तविक सुंदरता बाहरी सफलता में नहीं, बल्कि भीतर की स्थिरता, समझ और प्रेम में है।
‘हाउस हसबैंड’ एक सामाजिक-मनोवैज्ञानिक उपन्यास है, जिसकी सबसे बड़ी शक्ति उसका विषय और उसकी संवेदनात्मक ईमानदारी है। सुरजीत मान जलईया सिंह ने एक ऐसे पुरुष को केंद्र में रखा है जिसकी पीड़ा समाज सामान्यतः देखना नहीं चाहता। उपन्यास यह स्थापित करता है कि— घर में रहना निष्क्रिय होना नहीं है। घरेलू जिम्मेदारी निभाना पुरुषत्व का ह्रास नहीं है। पत्नी की सफलता पति की असफलता नहीं है और समाज की स्वीकृति मनुष्य के आत्मसम्मान का अंतिम प्रमाण नहीं है। मान जब यह समझ लेता है कि परिवार की हँसी, बच्चों की मुस्कान और मोनिका का विश्वास ही उसके जीवन की वास्तविक संपदा हैं, तब उसकी यात्रा पूर्ण होती है। उपन्यास में यही बोध ‘घर की धड़कन’ के रूपक में परिणत होता है।
हाउस हसबैंड को केवल ‘एक पुरुष के घर सँभालने की कहानी’ कहना इसके व्यापक अर्थ को सीमित करना होगा। यह वास्तव में पहचान की तलाश, सामाजिक पूर्वाग्रह से संघर्ष, दांपत्य की साझेदारी और आत्मसम्मान की पुनर्प्राप्ति की कथा है।
इस उपन्यास की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि यह पाठक से पूछता है—हम किसी व्यक्ति को उसके काम से पहचानते हैं या उसके मानवीय मूल्य से? और अंततः इसका उत्तर भीतर से आता है—सम्मान पद से नहीं, संवेदना और जिम्मेदारी से अर्जित होती है।
उपन्यास की भाषा मुख्यतः सरल, सहज, संवादधर्मी और मनोवैज्ञानिक है। लेखक ने भारी-भरकम साहित्यिक भाषा के स्थान पर दैनिक जीवन के अनुभवों और संवादों को प्राथमिकता दी है। लेखक ने स्वयं अपनी शैली को आत्मकथात्मक, मनोवैज्ञानिक और यथार्थवादी रखने की बात कही है तथा भाषा, संवाद और घटनाओं को सामान्य जीवन और वास्तविकता से जोड़ने का प्रयास बताया है।’ इस शैली की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि पाठक मान के बाहरी जीवन से अधिक उसके भीतरी जीवन में प्रवेश करता है।
उपन्यास में डायरी का प्रयोग विशेष रूप से प्रभावी है। डायरी मान के लिए केवल लेखन का माध्यम नहीं, बल्कि आत्मरक्षा और आत्मविश्लेषण का माध्यम है। जब वह समाज से अपनी बात नहीं कह पाता, तब वह डायरी से संवाद करता है। इस कारण उपन्यास में आत्मसंवाद का स्वर प्रबल हो जाता है।इस तकनीक से पाठक को पात्र के मन में सीधे प्रवेश करने का अवसर मिलता है और उपन्यास का मनोवैज्ञानिक पक्ष मजबूत होता है।
निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि ‘हाउस हसबैंड’ समकालीन हिंदी कथा-साहित्य में पुरुष की घरेलू भूमिका और उसकी आंतरिक दुनिया पर गंभीर संवाद आरंभ करने वाली उल्लेखनीय कृति है।
पुस्तक: हाउस हसबैंड ( उपन्यास)
लेखक: सुरजीत मान जलईया सिंह
प्रकाशक: श्वेतवर्णा प्रकाशन, नई दिल्ली
प्रकाशन वर्ष: 2026
मूल्य : ₹399 ( सजिल्द)
समीक्षक :डाॅ बिपिन पाण्डेय रायबरेली ( उत्तर प्रदेश) मोबाइल-9412956529

