कनाडा की तरह भारत क्यों नहीं ले पा रहा ट्रंप के खिलाफ सख्त रुख – मामलों के जानकारों से समझें

ताज़ा खबर देश-विदेश

नई दिल्ली । कनाडाई प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की दबाव की रणनीति को न केवल खुलेआम खारिज किया है, बल्कि उसी दृढ़ता से जवाब दिया है, जो उनके पूर्ववर्ती जस्टिन ट्रूडो की नीति से बिलकुल अलग है। कार्नी ने ट्रंप द्वारा टैरिफ को हथियार बनाने के खिलाफ एक स्पष्ट रेड लाइन खींची है। कनाडा की अर्थव्यवस्था अपने शक्तिशाली पड़ोसी अमेरिका से गहराई से जुड़ी होने के बावजूद, कार्नी ने ट्रंप के 50 प्रतिशत टैरिफ के जवाब में डॉलर के बदले डॉलर वाली जवाबी कार्रवाई की कसम खाई है। कार्नी ने अमेरिका की उन मांगों को अस्वीकार्य बताया है, जिसमें कनाडा की दूसरे देशों से व्यापार समझौते करने की क्षमता को सीमित करना शामिल है, इस मांग को वह संप्रभुता पर हमला मानते हैं। उनके अनुसार, नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था कमजोर पड़ रही है, और शक्तिशाली देश वहीं करते हैं जो कर सकते हैं, कमजोरों को सहना पड़ रहा है। कनाडा में बाय कैनेडियन अभियान की लोकप्रियता दर्शाती है कि जनता अपनी सरकार के इस साहसिक कदम के साथ खड़ी है।
इसके बाद सवाल उठता है कि कनाडा ने जैसी हिम्मत दिखाई, वैसी भारत ने क्यों नहीं? भू-राजनीति के विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी मानते हैं कि कार्नी ने जो साहस दिखाया, वह दुर्लभ है। चेलानी के अनुसार, ट्रंप प्रशासन से बातचीत हमेशा एक जोखिमभरा शक्ति-परीक्षण होती है, क्योंकि ट्रंप अपनी शर्तें लगातार बदलते रहते हैं। कनाडा को मिला ट्रंप का प्रस्ताव, वास्तव में एक व्यापार समझौता नहीं, बल्कि संरक्षणवादी व्यवस्था थी, जिसमें स्थायी टैरिफ निहित थे, ठीक वैसा ही संकेत जो भारत को भी मिला है।
राजनीति विज्ञानी भरत कर्नाड ने नरेंद्र मोदी की संयमित प्रतिक्रिया को रणनीतिक परिपक्वता नहीं, बल्कि आत्मसमर्पण बताया है। कर्नाड का तर्क है कि भारत को वॉशिंगटन पर अपनी निर्भरता कम करनी चाहिए और बातचीत में अधिक सख़्त रुख़ अपनाना चाहिए। वे कार्नी की सराहना कर कहते हैं कि कनाडा का रुख़ इसलिए भी ख़ास है क्योंकि उसकी 77 फ़ीसदी निर्यात अमेरिका पर निर्भर है। इस मज़बूत पकड़ के बावजूद, कार्नी ने ट्रंप को चुनौती दी, जो दर्शाता है कि कनाडा अब ट्रंप की मनमानी से तंग आ चुका है।
भारत की स्थिति हालांकि भिन्न है। कर्नाड मानते हैं कि भारत को ट्रंप की नीतियों को सिर्फ अस्थायी बदलाव नहीं, बल्कि अमेरिकी विदेश नीति में दीर्घकालिक बदलाव के रूप में देखना चाहिए। भारत के लिए मामला केवल टैरिफ विवाद तक सीमित नहीं है, भारत को चीन की बढ़ती चुनौती के बीच इंडो-पैसिफिक में अमेरिका के साथ रक्षा, ख़ुफिया, तकनीक और कूटनीतिक तालमेल बनाए रखने की जरुरत है। इसलिए, भावनात्मक रूप से संतोषजनक होने वाला टकराव, रणनीतिक रूप से महंगा पड़ सकता है। मोदी सरकार के लिए संभावित रणनीति यह है कि विवादों को सीमित रखा जाए, बड़े रणनीतिक संबंध को बचाया जाए, और ट्रंप के साथ व्यक्तिगत मुक़ाबले में बदले बिना रियायतें हासिल की जाएं।