वाल्मीकि योद्धा वीर चौधरी मनुवा पहलवान : एक परिचय 

साहित्य

चौधरी मनुवा पहलवान का जन्म गुड़गांव जिले की प्रसिद्ध दमदमा झील के पास वर्तमान में उजड़ा हुआ मुग़ल काल में आबाद गांव शालीखेड़ा में मुगल काल औरंगजेबी काल में चौधरी बिल्ला पहलवान व हरदेई के घर में हुआ। 

इनके पिता चौधरी बिल्ला पहलवान (वाल्मीकि चिंडालिया गौत्र ) उस जमाने में आस पास के अपनी बिरादरी के चौबीस गांवों की पंचायत (चौधराहट ) के चौधरी थे। चौधरी बिल्ला पहलवान व हरदेई के तीन बच्चे हुए सबसे बड़े मनुवा इनसे छोटी इनकी बहन और सबसे छोटे उस समय के प्रसिद्ध संत पीरूशाह थे। संत पीरूशाह का जन्म वंशावली परम्पराओं व उस समय के कवि शायरों की रचनाओं के अनुसार 5 नवम्बर 1662 कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि को हुआ इनसे बड़ी इनकी बहन और उससे बड़े मनुवा पहलवान अनुश्रुतियों के

मुताबिक ये संत पीरूशाह जी से नौ दस वर्ष बड़े थे । यानि 1652 के आसपास इनका जन्म हुआ था। इनका विवाह रायसीना गांव में उस वक्त के मेहतर बिरादरी की जातिय पंचायत चौधराहट के तीन सौ साठ के चौधरी भुक्कड़ सौदा के घर उनकी बड़ी बेटी गजना से हुआ, गजना से छोटी उसकी बहन सोना थी और बड़े भाई थे बोदन। चौधरी बिल्ला पहलवान की मृत्यु के बाद शालीखेड़ा चौबीसी की चौधराहट उनके बड़े बेटे मनुवा पहलवान को मिली उधर चौधरी भुक्कड़ सौदा के बाद तीन सौ साठ की चौधराहट बोदन सौदा को मिली खैर समय बीतता गया, उस जमाने में संत पीरूशाह जी महाराज समाज में दूर-दूर तक घूम घूम कर सामाजिक कुरीतियों का विरोध कर रहे थे जिनमें मुख्यतः सती प्रथा, बेगारी( बेगार प्रथा ) सामाजिक, जातिय गुलामी के खिलाफ और विधवा विवाह का खुलकर समर्थन करते थे। चौधरी मनुवा पहलवान व चौधरी बोदन सौदा संत पीरूशाह जी के सिर्फ समर्थक ही नहीं बल्कि बहुत बड़े सहयोगी भी थे। 

उस जमाने की प्रसिद्ध मथुरा की पंचायत में संत पीरूशाह जी के सबसे बड़े सहयोगीयों के रुप में ये ही थे। जब रायसीना के ऊपर पहाड़ पर आगे औरंगजेब के आदेश पर उसका एक अधिकारी बेग मोहम्मद लश्करी ने सराय बनवाने के कार्य के लिए आस पास की अछूत बिरादरीयों के चौधरी, प्रमुख लोगों को बुलाकर यह फरमान सुनाया कि तुम लोग कल से अपने अपने आदमियों को लेकर यहां सभी को बेगार देनी होगी। तो वहां चौधरी बोदन भी मौजूद था किन्तु हां करने के अलावा वहां उसके पास कोई चारा नहीं था। लेकिन घर आने के बाद उसने आस पास के लोगों को इकट्ठा कर यह निर्णय लिया चाहे कुछ हो जाए हम बेगार नहीं देंगे, और वह अपने सभी लोगों को लेकर चौधरी मनुवा पहलवान के पास शालीखेड़ा आ गया, चौधरी मनुवा पहलवान ने रात में ही आपातकालीन पंचायत बुलाकर निर्णय लिया चाहे कुछ हो जाए औरंगजेब ही क्यों ना आ जाए हमारे लोग बेगार नहीं देंगे।

और चौधरी मनुवा पहलवान ने सभी के भोजन विश्राम की व्यवस्था की जब यह पंचायत चल रही थी इसे चुपके से एक पुरोहित जो बगल के गांव का था संत पीरूशाह जी और चौधरी मनुवा पहलवान से द्वेष रखता था, बदले का सही मौका देख वह मुगल अधिकारी के पास पहुंच कर सारी कहानी नमक मिर्च लगाकर बताई यह सुन मुग़ल अधिकारी भड़क गया और इन मेहतरों को सबक सिखाने के लिए सैना लेकर शालीखेड़ा की और चल दिया कहते हैं मुग़ल सैना ने सुबह-सुबह शालीखेड़ा पर चढ़ाई कर दी अचानक से आई विपदा देख सब अचंभित रह गए। किंतु वीर वीर ही होतें हैं, विरेंद्र गुप्त आर्य समाजी विद्वान लिखते हैं यह देख मनुवा की रणभेरी गूंज उठी, दोनों तरफ से भाले तलवारें लाठी चलने लगी गजना दोनों हाथों में तलवार ले चंडी का रूप धारण कर शत्रु दल पर टूट पड़ी घमासान युद्ध हुआ संत पीरूशाह जी ने भयंकर युद्ध करते हुए बहुत से बच्चों स्त्री बुजुर्गों को सुरक्षित निकाला और जंगल की और निकाल दिया।

इस लड़ाई में शालीखेड़ा पूरी तरह उजाड़ दिया गया और ज्यादा तर मेहतर योद्धा वीरगति को प्राप्त हुए सैना की संख्या बहुत अधिक थी मेहतर वीर कम थे । विरेंद्र गुप्त लिखते हैं कि बार बार मुग़ल सैना को पीछे हटने पर इन वीर वीरांगनाओं ने मजबूर किया , गजना की तलवार ने मुग़ल सैना को गाजर मूली की तरह काटा किंतु सैना बहुत अधिक संख्या में थी अंततः ये वीर वीरांगनाएं वीरगति को प्राप्त हुए कहते हैं अकेले वीर मनुवा पहलवान बचे वे काबू नहीं आये अपने भाई और पत्नी को वीरगति को प्राप्त होते देख मनुवा पहलवान बुरी तरह बिखर गया उसकी तलवार अब रोके नहीं रुक रही थी यह देख लश्करी घबरा गया उसने अपनी सैना को आदेश दिया यह मेहतर इस तरह काबू नहीं आएगा इसे मोटी मोटी रस्सी यों के फंदे बनाकर बांधों नहीं यह हम सब को यहीं खेत कर देगा।

ऐसा ही किया गया और वीर मनुवा पहलवान को लोहे की मोटी जंजीरों से बांध कर अखाड़े के बड़े पेड़ पीपल के पेड़ से बांधा गया। 

लश्करी ने कहा मनुवा मैं ने अपने जीवन में तेरे जैसा वीर नहीं देखा।

मैं कहता हूं तू इस्लाम धर्म कबूल कर के मेरी सैना में आजा तुझे सब कुछ दुंगा। मनुवा पहलवान ने कहा कायर यदि दम है तो एक बार मुझे खोलके देख पाता चल जाएगा कौन कितने पानी में है। जब मनुवा पहलवान किसी भी तरह नहीं माना तो मुग़ल अधिकारी ने आदेश दिया इसे इसी पेड़ में फांसी पर लटका दो और लटका रहने दो 

इस तरह यह वीर अपने परिवार के साथ लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुआ । सराय लश्कराबाद की सराय के शिलालेख के अनुसार यह समय 1695 का था।किंतु दुर्भाग्य रहा है जातिवादी कलमकारों ने ऐसे महान वीर वीरांगनाओं के इतिहास को लिखने के बजाय समय की गर्द में दबाने का ही काम किया है।

किंतु वाल्मीकि समुदाय ने अपने इतिहास को गुरु शिष्य परंपरा व वंशावली परम्पराओं में याद रखकर सदा जीवित रखा।

हंसराज भारतीय 

कवि – लेखक व इतिहासकार