नई दिल्ली । दिल्ली उच्च न्यायालय ने हाल ही में अपने एक महत्वपूर्ण निर्णय में ‘तेज रफ्तार’ को एक सापेक्ष शब्द (रिलेटिव टर्म) बताया है। न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि किसी वाहन का तेज गति से चलना और किसी दुर्घटना में शामिल होना, यह अपने आप में यह साबित नहीं करता कि चालक लापरवाही या उतावलेपन से गाड़ी चला रहा था। न्यायालय ने यह फैसला 2009 के एक सड़क हादसे से जुड़े मामले में सुनाया, जिसमें एक महिला की मौत हो गई थी और एक टेंपो चालक को आरोपी बनाया गया था। इस मामले में, उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के उस फैसले को बरकरार रखा जिसमें टेंपो चालक को बरी कर दिया गया था।
न्यायमूर्ति चंद्रशेखरन सुधा ने इस मामले की सुनवाई की। इस मामले में मृतका का पुत्र ही एकमात्र प्रत्यक्षदर्शी था। न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि ‘हाई स्पीड’ या ‘ओवरस्पीड’ सापेक्ष शब्द हैं। अभियोजन पक्ष (प्रॉसीक्यूशन) के ऊपर यह जिम्मेदारी है कि वह ऐसे ठोस सबूत पेश करे जिससे यह सिद्ध हो सके कि आखिर ‘हाई स्पीड’ का वास्तविक अर्थ क्या था। सिर्फ एक शब्द के आधार पर लापरवाही या उतावलेपन को लेकर कोई धारणा नहीं बनाई जा सकती। न्यायालय ने इस बात पर भी जोर दिया कि आपराधिक मुकदमे में अभियोजन को अपराध के प्रत्येक तत्व को साबित करना होता है, जबकि आरोपी को तब तक निर्दोष माना जाता है, जब तक उसका अपराध संदेह से परे सिद्ध न हो जाए। उच्च न्यायालय के इस फैसले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर ‘तेज रफ्तार’ की कानूनी परिभाषा क्या है और क्या सिर्फ तेज गति होने से ही कोई चालक अपराधी बन जाता है।
इस 2009 के मामले में, एक महिला की सड़क हादसे में मौत हो गई थी और इसका आरोप एक टेंपो चालक पर लगा था। मामले की कई सालों तक सुनवाई चली और अंततः निचली अदालत ने टेंपो चालक को बरी कर दिया था। महिला के परिजनों ने इस फैसले को दिल्ली उच्च न्यायालय में चुनौती दी। सुनवाई के दौरान, न्यायालय ने अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत किए गए सबूतों में मौजूद कमियों की ओर ध्यान आकर्षित किया। न्यायालय ने कहा कि जब प्रत्यक्षदर्शी यह दावा कर रहा है कि टक्कर लगने के बाद वह सड़क पर गिर गया था, लेकिन उसे कोई चोट नहीं आई, तो यह असंभव सा लगता है। यदि कोई व्यक्ति सड़क पर गिरता है, तो कम से कम उसके शरीर पर खरोंच के निशान तो होने ही चाहिए। गवाह ने यह भी दावा किया था कि टेंपो ने साइकिल के बाईं ओर टक्कर मारी थी, लेकिन अदालत ने पाया कि अगर गवाह की बात मानी जाए तो टेंपो के दाहिने हिस्से पर डेंट आना चाहिए था, जबकि हल्का सा डेंट बाईं तरफ आया था। ऐसे में, निचली अदालत द्वारा टेंपो चालक को बरी करने का फैसला सही है, क्योंकि कहीं से भी यह साबित नहीं हो रहा था कि टेंपो चालक लापरवाही या उतावलेपन में वाहन चला रहा था।

