एयर इंडिया हादसा और डोप टेस्ट: सकारात्मक रिपोर्ट का मतलब क्या नशे में होना है?

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नई दिल्ली । फुकेट से दिल्ली आ रही एयर इंडिया की फ्लाइट में 300 फीट की अचानक गिरावट से हुए हादसे ने विमानन सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। इस घटना में 20 यात्री और 4 क्रू सदस्य घायल हुए। प्रारंभिक जांच में पायलट-इन-कमांड (पीआईसी) का ड्रग टेस्ट मारिजुआना के लिए सकारात्मक पाया गया, जिससे ड्रग पॉजिटिव होने और नशे में होने के बीच के अंतर पर बड़ी बहस छेड़ दी है।
उड़ान के दौरान पीआईसी के कॉकपिट के फर्श पर बैठने और क्रू की शिकायतों ने उनकी क्षमता पर सवाल उठाए हैं, हालांकि ट्रिपल हाइड्रोलिक फेलियर की बात भी सामने आई है। विमान दुर्घटना जांच ब्यूरो (एएआईबी) जल्द ही शुरुआती रिपोर्ट जारी करेगा।
विशेषज्ञों का मत है कि ड्रग टेस्ट का सकारात्मक आना हमेशा यह नहीं दिखाता कि पायलट नशे में था या उसकी कार्यक्षमता प्रभावित थी। शरीर में प्रतिबंधित पदार्थ की उपस्थिति और उड़ान के दौरान उसकी क्षमता पर प्रभाव, ये दो भिन्न विषय हैं। उदाहरण के तौर पर, ऑस्ट्रेलिया में एक हेलिकॉप्टर दुर्घटना के बाद पायलट के शरीर में कोकीन के मेटाबोलाइट्स की कम मात्रा मिली थी, पर जांच में क्षमता प्रभावित होने के कोई सबूत नहीं थे।
पायलटों की संस्था एएलपीए इंडिया भी बताती है कि सामान्य खांसी या नींद की दवाएं भी टेस्ट को नॉन-निगेटिव कर सकती हैं। शराब के विपरीत, ड्रग टेस्टिंग यह नहीं बता पाती कि पदार्थ कब लिया गया और उड़ान के समय उसका वास्तविक असर था या नहीं। अमेरिकी एजेंसी की रिपोर्ट दर्शाती है कि 2018-2022 के दौरान दुर्घटनाग्रस्त 53 प्रतिशत अमेरिकी पायलट ड्रग पॉजिटिव थे, पर केवल 29 प्रतिशत में ही क्षमता-प्रभावित करने वाले पदार्थ पाए गए, जिसमें सामान्य एंटीहिस्टामाइन प्रमुख था। एयर इंडिया की घटना ने नागर विमानन महानिदेशालय (डीसीजीए) के सामने ऐसी वैज्ञानिक और निष्पक्ष प्रणाली बनाने की चुनौती रखी है, जो दोषी पायलटों को पकड़े, लेकिन जिनकी क्षमता प्रभावित नहीं थी, उन्हें बेवजह दंडित न करे।