एसआईआर में मतदाताओं के नाम हटाना बड़े पैमाने की ‘‘शाह इंस्टीगेटेड रिमूवल’’

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-जयराम रमेश ने लगाए आरोप कहा- इस तरह की प्रक्रिया ‘‘संविधान पर हमला’’
नई दिल्ली । कांग्रेस ने रविवार को निर्वाचन आयोग द्वारा एसआईआर के दौरान बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने का मुद्दा उठाया और आरोप लगाया कि एसआईआर वास्तव में मतदाताओं के नाम हटाने की एक बड़े पैमाने की ‘‘शाह इंस्टीगेटेड रिमूवल’’ यानी शाह के इशारे पर मतदाताओं के नाम हटाने की प्रक्रिया और ‘‘संविधान पर हमला’’ है। कांग्रेस ने कहा कि इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि कई राज्यों में बड़े पैमाने पर हटाए गए नामों में सबसे ज्यादा संख्या समाज के आर्थिक और सामाजिक रूप से सबसे कमजोर और वंचित वर्गों से आने वाले मतदाताओं की है।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने कहा कि भारत निर्वाचन आयोग ने जून 2025 में बिहार में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण की पहले चरण की प्रक्रिया शुरू की थी। इसके बाद नवंबर 2025 में नौ राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में दूसरा चरण शुरू किया गया। रमेश ने कहा कि चरण-1 और चरण-2 में 7.8 करोड़ मतदाताओं के नाम हटा दिए गए। उन्होंने कहा कि एसआईआर से पहले की मतदाता सूची में दर्ज कुल नामों में से 13 फीसदी नाम हटा दिए गए हैं। रमेश ने कहा कि तीसरे चरण की शुरुआत 2026 के मध्य में 16 राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में हुई। उन्होंने बताया कि तीसरे चरण में अब तक 12 राज्यों और दो केंद्र शासित प्रदेशों के उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक कुल 36.06 करोड़ मतदाताओं में से 6.18 करोड़ के नाम हटा दिए गए हैं।
रमेश ने कहा कि नाम हटाए जाने की दर 17 प्रतिशत से अधिक है। इसके अलावा 5.43 करोड़ मतदाताओं को अतिरिक्त दस्तावेज पेश करने के लिए नोटिस जारी किए हैं, ताकि मतदाता सूची में उनके नाम बरकरार रखे जा सकें। इससे नाम हटाए जाने का जोखिम और 15 फीसदी बढ़ जाता है। यह असामान्य रूप से बड़ा अनुपात है, जो पूरी एसआईआर प्रक्रिया में संरचनात्मक खामियों को दर्शाता है। उन्होंने सवाल किया कि इतने बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने के बाद भी इतने ज्यादा मतदाताओं को अपने नाम ‘‘सत्यापित’’ कराने की जरूरत कैसे पड़ रही है।
उन्होंने कहा, कि इस तरह कुल 32 फीसदी यानी करीब हर तीन में से एक मतदाता का नाम या तो हटा दिया गया है या उसके हटाए जाने का खतरा है। इस संबंध में राज्यों की स्थिति इस प्रकार है- दिल्ली 53.73, चंडीगढ़ 52.58, झारखंड 39.57, उत्तराखंड 35.71, मेघालय 35.36, महाराष्ट्र 33.88, तेलंगाना 48.90, कर्नाटक 27.6, हरियाणा 37.5, ओडिशा 23.67, आंध्र प्रदेश 21.17 और पंजाब 15.23 फीसदी लोगों के नाम हटाए गए। कर्नाटक, तेलंगाना और झारखंड में जिन मतदाताओं के नाम हटाए जाने का खतरा है, उनकी सूची सार्वजनिक कर दी गई है, ताकि मतदाता उसमें अपना नाम देख सकें। उन्होंने कहा कि दिल्ली ने यह सूची 19 सितंबर 2026 को सार्वजनिक की और वह भी केवल जन दबाव के कारण।
भाजपा शासित अन्य राज्यों के साथ-साथ पंजाब ने अब तक ऐसा नहीं किया है। रमेश ने दावा किया कि ज्यादातर बड़े राज्यों में एसआईआर प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची से पुरुषों की तुलना में महिलाओं के ज्यादा नाम हटाए गए हैं। रमेश ने कहा कि एसआईआर के जरिए सरकार ने अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया है और मतदाता सूची में नाम बनाए रखने के लिए जरूरी दस्तावेज जुटाने का बोझ नागरिकों पर डाल दिया, जबकि संभव है कि इनमें से कुछ दस्तावेज सरकार ने उन्हें कभी जारी ही न किए हों। उन्होंने कहा कि ऐसी जांच प्रक्रिया, जिसे देश के अधिकांश नागरिक पूरा ही नहीं कर सकते, दरअसल लोगों को मतदाता सूची से बाहर करने का माध्यम बनकर रह जाती है। रमेश ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का स्पष्ट संदर्भ देते हुए कहा, ‘‘एसआईआर वास्तव में मतदाताओं को हटाने की एक बड़े पैमाने की ‘शाह इंस्टीगेटेड रिमूवल’ प्रक्रिया है। यह हमारे संविधान पर हमला है।