सराफा नाइट चौपाटी में 80 विक्रेताओं की सीमा खत्म, निगम-एसोसिएशन तय नहीं कर सकते कौन लगाएगा स्टॉल

इंदौर

:: हाई कोर्ट ने आठ विक्रेताओं को दी राहत; दुकान मालिक की सहमति से कारोबार की अनुमति, निगम की भूमिका स्वच्छता-सुरक्षा तक सीमित ::
इंदौर । सराफा नाइट चौपाटी में केवल 80 विक्रेताओं को स्टॉल लगाने की अनुमति देने के नगर निगम के आदेश को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने निरस्त कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि निजी दुकानों के सामने रात में स्टॉल लगाने के मामले में संबंधित स्थायी दुकान मालिक की सहमति होने पर निगम या निजी व्यापारी एसोसिएशन विक्रेता को हटाने का आधार नहीं बन सकते। आदेश से चौपाटी से हटाए गए आठ विक्रेताओं के दोबारा कारोबार शुरू करने का रास्ता साफ हो गया है।
न्यायमूर्ति सुबोध अभ्यंकर और न्यायमूर्ति जय कुमार पिल्लै की खंडपीठ ने डब्ल्यूपी नंबर 19844/2026 में कोशल लोधी एवं अन्य बनाम इंदौर नगर निगम एवं अन्य मामले में यह आदेश दिया। याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता उमंग नलवाया ने पैरवी की।
:: एसोसिएशन की सूची दुकान मालिक की सहमति को निष्प्रभावी नहीं कर सकती ::
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि निगम ने उन्हें बिना पूर्व नोटिस और सुनवाई के सराफा से हटा दिया था। इसके बाद पहले करीब 69 और फिर 80 विक्रेताओं को कारोबार की अनुमति दी गई। यह सूची सराफा गोल्ड एंड सिल्वर एसोसिएशन और सराफा नाइट चौपाटी एसोसिएशन की सिफारिशों के आधार पर तैयार की गई थी। याचिकाकर्ताओं ने संबंधित स्थायी दुकान मालिकों की लिखित सहमति भी अदालत में प्रस्तुत की।
हाई कोर्ट ने कहा कि निजी एसोसिएशन के पास कोई वैधानिक या कानूनी अधिकार नहीं है, जिसके आधार पर वह दुकान मालिक द्वारा किसी विक्रेता को दी गई व्यक्तिगत सहमति को निष्प्रभावी कर सके। अदालत ने दोनों एसोसिएशनों को याचिकाकर्ताओं के वेंडिंग अधिकार में हस्तक्षेप करने अथवा दुकान मालिक की सहमति के विपरीत शर्तें तय करने से रोक दिया।
:: सराफा न निगम की चौपाटी, न घोषित वेंडिंग जोन ::
अदालत ने कहा कि सराफा मुख्य रूप से निजी स्वामित्व वाली आभूषण दुकानों वाला व्यावसायिक क्षेत्र है। स्थायी दुकानें बंद होने के बाद रात में खाद्य स्टॉल संबंधित दुकानों के सामने के गलियारों और स्थानों पर लगाए जाते हैं। यह क्षेत्र निगम द्वारा आधिकारिक रूप से घोषित चौपाटी या वेंडिंग जोन नहीं है।
ऐसी स्थिति में निगम खुद को मकान मालिक या स्टॉल आवंटन प्राधिकारी के रूप में स्थापित नहीं कर सकता। जब तक स्टॉल सार्वजनिक आवागमन के मार्ग पर स्थायी अतिक्रमण नहीं करता, निगम यह तय नहीं कर सकता कि किसे स्टॉल लगाने दिया जाए और किसे बाहर रखा जाए।
:: 80 विक्रेताओं के चयन के मानदंड भी सवालों के घेरे में ::
निगम ने 80 विक्रेताओं के चयन के लिए मुख्य रूप से पारंपरिक खाद्य पदार्थ बेचने और पांच वर्ष से अधिक समय से व्यवसाय करने जैसे मानदंड अपनाए थे। कोर्ट ने कहा कि इन मानदंडों का कोई वैधानिक आधार नहीं है और इन्हें मनमाने तरीके से लागू किया गया। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि अंतिम सूची में नए विक्रेता और गैर-पारंपरिक खाद्य पदार्थ बेचने वाले विक्रेता भी शामिल थे।
:: निगम की भूमिका स्टॉल आवंटन नहीं, नागरिक व्यवस्था तक ::
हाई कोर्ट ने निगम की नागरिक जिम्मेदारियां बरकरार रखी हैं। निगम सराफा क्षेत्र में स्वच्छता, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन, खाद्य स्वच्छता, अग्नि सुरक्षा और आपातकालीन वाहनों के निर्बाध आवागमन को नियंत्रित और सुनिश्चित कर सकता है। सार्वजनिक मार्ग पर स्थायी अतिक्रमण तथा स्वास्थ्य, स्वच्छता या ठोस अपशिष्ट संबंधी नियमों के उल्लंघन पर वह कानून के अनुसार कार्रवाई भी कर सकेगा।
अदालत ने कहा कि स्वच्छता और सुरक्षा के नियमन की आड़ में विक्रेताओं के आजीविका के अधिकार और व्यापार के अधिकार को मनमाने तरीके से समाप्त नहीं किया जा सकता। इसी आधार पर 80 चयनित विक्रेताओं तक वेंडिंग सीमित करने वाला निगम का आदेश निरस्त कर दिया गया।
:: आठों विक्रेताओं को अपने-अपने स्थल पर लौटने की अनुमति ::
कोर्ट ने निर्देश दिया कि आठों याचिकाकर्ताओं को अपने संबंधित स्थलों पर दोबारा कारोबार शुरू करने दिया जाए, बशर्ते उनके पास उन स्थायी दुकान मालिकों की आवश्यक सहमति या अनुमति हो, जिनके परिसरों के बाहर वे रात में स्टॉल लगाते हैं। निगम को कानून के तहत स्वच्छता, खाद्य सुरक्षा, अग्नि सुरक्षा और सार्वजनिक आवागमन से जुड़े नियमों का पालन कराने का अधिकार रहेगा। अदालत ने लागत के संबंध में कोई आदेश नहीं दिया।