भारत ने अंतरिक्ष में हथियारों की तैनाती पर की प्रतिबंध की मांग

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जिनेवा । अंतरिक्ष के बढ़ते सैन्यीकरण और इसके हथियारकरण से जुड़े गंभीर जोखिमों के बीच भारत ने बाहरी अंतरिक्ष में हथियारों की तैनाती पर रोक लगाने के लिए एक व्यापक और कानूनी रूप से बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय संधि अपनाने की वकालत की है। राज्यसभा सदस्य सुधा मूर्ति ने हाल ही में कहा कि भारत एक ऐसे कानूनी रूप से बाध्यकारी दस्तावेज को प्राथमिकता देता है, जो सार्वभौमिक रूप से स्वीकार्य हो, सत्यापन योग्य हो और बहुपक्षीय बातचीत से तय किया गया हो। उन्होंने जोर दिया कि बाहरी अंतरिक्ष की सुरक्षा और स्थिरता के लिए खतरों, गलतफहमी और गलत आकलन के जोखिमों के साथ-साथ अंतरिक्ष में बल प्रयोग क्या माना जाएगा, इन सभी पर एक साथ विचार किया जाना चाहिए। उनका मानना है कि कुछ खतरों पर चुनिंदा ध्यान देना और दूसरों को नजरअंदाज करना उल्टा असर डालेगा। सुधा मूर्ति ने जिनेवा स्थित संयुक्त राष्ट्र के निरस्त्रीकरण सम्मेलन को इस संधि पर बातचीत के लिए उचित मंच बताया।
कार्रवाई की तत्काल आवश्यकता पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि दोहरे उपयोग वाली अंतरिक्ष तकनीकें और संपत्तियां अब एक वास्तविकता हैं। अंतरिक्ष में हथियारों की तैनाती का मुद्दा जटिल है और इस पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मतभेद बने हुए हैं। अमेरिका ने भी अंतरिक्ष में हथियार रखने की बात स्वीकार की है। अमेरिकी वायु सेना सचिव ट्रॉय मिंक ने इस महीने की शुरुआत में बताया था कि उनके देश ने कक्षा में अंतरिक्ष नियंत्रण हथियार तैनात किए हैं, हालांकि उन्होंने उनकी प्रकृति का खुलासा नहीं किया। भारत बाहरी अंतरिक्ष में हथियारों की तैनाती रोकने के लिए बनाए गए मसौदा संधि को आगे की चर्चा के लिए एक आधार के रूप में देखता है। पहले चीन और रूस ने 2008 में इस तरह के मसौदे का प्रस्ताव रखा था, जिसका मुख्य रूप से अमेरिका ने यह कहते हुए विरोध किया था कि यह अस्पष्ट है, पृथ्वी-आधारित एंटी-सैटेलाइट सिस्टम से खतरों का समाधान नहीं करता और इसकी सत्यापन प्रणाली अपर्याप्त है। हाल ही में, अमेरिका और जापान ने 2024 में सुरक्षा परिषद में अंतरिक्ष में परमाणु हथियारों को रोकने पर एक प्रस्ताव पेश किया था, जिसे रूस ने वीटो कर दिया। सुधा मूर्ति ने स्पष्ट किया कि भारत सार्वभौमिक और गैर-भेदभावपूर्ण, गैर-बाध्यकारी मानदंडों और पारदर्शिता तथा विश्वास-निर्माण उपायों के लिए खुला है, लेकिन ये कानूनी रूप से बाध्यकारी दस्तावेज के पूरक हो सकते हैं, उसका विकल्प नहीं।