संजीव-नी

एहसासों को लहु पिलाता हूं ।।

परछाई में तेरी रंग मिलाता हूं,

एहसासों को लहु पिलाता हूं ।।

जिंदगी से तेरी,तो गुजर गया हूं ,

पर रूह में तुझे हर पल पाता हूं ।

तस्वीरों पर तेरी पड़ गई धुंध ,

एहसासों उसकी धूल हटाता हूं।।

अलविदा कहा तेरी परछाइयों ने भी ,

पराया होकर,पराया नहीं रह जाता हूं।

तेरा एहसास बडा इंद्रधनुषी जानम,,

तेरे ख्यालो में ही जिया जाता हूँ।।

तेरे सांसों की खुशबू से इतर,

कोई और खुशबू नहीं ले पाता हूं ।.

न जाने कितने गुलशनों में भटका,

हसीन तुझसा फूल नहीं चुन पाता हूं।

महकती आ जाओ कभी मेरी तरफ,

सारी रतिया आंखों में ही गुजार जाता हूं।

तेरी खुशबू से तरबतर अभी तक हूं,

उसके एहसास से ही शर्मा जाता हूं।।

बंदीशें से तुझ पर भी है बहुत, संजीव,

हवाओं में ही तेरे नाम ग़ज़ल लिख जाता हूं।

संजीव ठाकुर, अंतरराष्ट्रीय कवि, रायपुर 9009 415 415