करवाचौथ का चांद

आकर्षित करती महिलाये साजन को,

गोल चांद जैसी बिंदी बना माथे पे सजाती।।

शुक्र है चांद आसमान में विराजित है,

वरना उसे ही रंगीन कर बिंदी बना लेती!!

मेंहदी के रस में घोलकर प्रेम की चाशनी

हाथों की महीन लकीरों में मिठास बिखेरती।।

इक दिन अन्न जल बिसरा कर प्रेम में जीती,

मांग के सिंदूर की उम्र बढ़ाती ये महिलाये!!

इक दिन ही सही पायल, बिछुए, कंगन झुमके,

दिन भर सज धज कर घर को स्वर्ग बनाती!!

सुहागिनों के समूह को स्वर्ग से गौरा भी निहारती,

मनमोहक शमा होता जब छलनी से पिया देखती!!

भगवती सक्सेना गौड़